दिन का तापमान बढ़ते ही तिलहनी फसलों में लगने वाले माहो कीट ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। इस वर्ष सरसों की खेती अच्छी होने के साथ फूल और फली को देखकर किसान इस उम्मीद में हैं कि उत्पादन अधिक होने पर आर्थिक स्थिति में सुधार किया जा सकेगा।
डीघ के दरवांसी निवासी आनंद सिंह ने बताया कि गेहूं की फसल के साथ सरसों की बुआई न कर एक बीघा में अलग से सरसों की खेती की गई है। जब तक दिन का तापमान कम था तब तक फसल में लगे फूलों पर कोई असर नहीं पड़ा। जैसे-जैसे दिन का तापमान बढ़ रहा है, वैसे-वैसे फसल में फलियां लगनी शुरू हो गई हैं और माहो कीट का प्रकोप भी बढ़ता जा रहा है। किसान बसंत लाल ने बताया कि दो बीघे सरसों की बुआई की गई है अभी तक कोई चिंता नहीं थी। तीन दिन से धूप होने पर फसल में माहो कीट दिखने लगे हैं। कीट को भगाने के लिए बाजारों में बिक रहे कीटनाशक को महंगे दर पर खरीद कर रोकथाम में तेजी दिखाई जा रही है। बीते वर्षों में माहो कीट के कारण पूरी फसल चौपट हो गई थी। कई अन्य गांवों के किसानों सुबह फसल देखकर दोपहर बाद बाजारों का रुख करते देखे जा रहे हैं। उप कृषि निदेशक एके सिंह ने कहा कि तापमान बढ़ने से माहो कीट का प्रकोप जोर पकड़ता है। रोकथाम के लिए एग्री जंक्शन के रसायनों का छिड़काव कर राहत पा सकते हैं। कृषि रक्षा इकाइयों पर रसायनों की उपलब्धता है। कृषि विज्ञान केंद्र बेजवां के प्रसार विशेषज्ञ डॉ. आरपी चौधरी ने बताया कि माहो कीट की रोकथाम किसान जैविक विधि से कर सकते हैं। एक बीघा सरसों की फसल में छह एमएल नीम का तेल, तीन चुटकी कास्टिक सोडा लगभग 100 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। कास्टिक सोडे का मिश्रण इसलिए कराया जाता है, क्योंकि नीम का तेल पानी में घुलनशील नहीं होता है। सोडे का मिश्रण होने पर नीम का तेल आसानी से घुल कर छिड़काव योग्य हो जाता है। घोल का छिड़काव अपराह्न में करना चाहिए। बाजारों में तरह-तरह के कीटनाशक उपलब्ध हैं, लेकिन मधुमक्खियों के लिए जानलेवा हैं। इसी समय लोग स्वरोजगारी मधुमक्खी को सुबह के समय छोड़ते हैं, जो फूलों से भरी सरसों की फसल से रस चूसती हैं।