जिला अस्पताल में मरीज को देखते डॉक्टर। संवाद
कालीन नगरी में 10 हजार बच्चे खून की कमी से जूझ रहे हैं। चिकित्सकों के अनुसार एक बच्चे में औसतन 11 मिलीग्राम हिमोग्लोबिन (खून) होना चाहिए, लेकिन 10 हजार से अधिक बच्चों में सात से आठ मिलीग्राम ही हिमोग्लोबिन है। खून की कमी से जूझने वाले तीन से पांच साल के बच्चे ज्यादा हैं। जिला अस्पताल की ओपीडी में रोजाना सात से आठ बच्चे ऐसे पहुंचते हैं। जिनमें खून की कमी होती है। चिकित्सकों के अनुसार खून की कमी से बच्चों में कई गंभीर बीमारी हो सकती है।
जिले में 0-5 साल तक के बच्चों की संख्या 2.70 लाख हैं। इसमें तीन से पांच साल तक के बच्चों की संख्या सवा लाख है। जिले के अस्पतालों में खून की कमी वाले बच्चों की संख्या बढ़ी है। इसमें अधिकतर बच्चे तीन से पांच साल तक के होते हैं। सौ शय्या अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ बीबी मिश्रा ने कहा कि तीन साल के बाद बच्चों में यह समस्या होती हैं क्योंकि दो साल तक बच्चे खान पान के लिए पूरी तरह से माता-पिता पर निर्भर होते हैं। इसके बाद वे बाहरी सामानों का सेवन करते हैं, जो उनकी स्वास्थ्य के लिहाज से ठीक नहीं होता। इसके अलावा जिले में हर दूसरी गर्भवती महिला में खून की कमी के लक्षण दिखते हैं। जिसका असर नौनिहालों की सेहत पर भी देखने को मिलता है। वहीं भदोही एमबीएस के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. राजेश रावत के अनुसार मां में खून की कमी होने पर ज्यादा संभावना है कि उनके बच्चों में भी खून की कमी हो। महाराजा चेतसिंह जिला चिकित्सालय में रोजाना सात से आठ मामले ऐसे आ रहे हैं। जिनमें बच्चों में हिमोग्लोबिन कम होने के लक्षण दिखते हैं। चिकित्सकों ने कहा कि कहा दवा के साथ अभिभावकों को बच्चों को पौष्टिक आहार देना चाहिए।जिला अस्पताल, सीएचसी, पीएचसी सहित उप स्वास्थ्य केंद्रों में हर साल 50 से 51 हजार प्रसव औसतन होते हैं। यानी हर माह चार हजार प्रसव होते हैं। बच्चे मां की गर्भ से ही खून की कमी से जूझते हैं, क्योंकि गर्भावस्था के दौरान महिलाएं पौष्टिक भोजन का सेवन नहीं करती है। इसके कारण बच्चों में खून की कमी होती है।
बच्चे मिट्टी खाए तो समझे उनमें खून की कमी
सौ शय्या अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. डीबी मिश्रा ने बताया कि जन्म के छठे महीने से बच्चों को अन्न खिलाना चाहिए। जैसे दाल का जूस, दलिया, दाल चावल, चावल का माड़ आदि बच्चों को चटाना चाहिए। इससे आयरन की कमी दूर हो जाती है, लेकिन ज्यादातर माताएं बच्चों को सिर्फ दूध पिलाती हैं। दो से ढाई साल बाद खून की कमी का पता चलता है। जब बच्चे मिट्टी खाने लगे तो समझ लेना चाहिए कि खून की कमी होने लगी है। ऐसे में तत्काल डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।