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उदवंत सिंह ने किया क्रांति का बीजारोपण

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ज्ञानपुर (भदोही)। नील की खेती करने वाले किसानों पर जुल्म करने वाली अंग्रेजी हुकूमत को ठाकुर उदवंत सिंह ने खुली चुनौती दी थी। अंग्रेज अफसरों के कोड़ों की मार और महिलाओं पर बुरी नीयत की जलालत से निजात दिलाने के लिए हथियार उठाकर वह आजादी के नायक बन गए। पाली गांव में नील की फैक्ट्री के मालिक सर जॉन ने मिर्जापुर के डिप्टी कलेक्टर मिस्टर मोर की मदद से उदवंत को फांसी पर चढ़वाकर उनकी हत्या करवा दी।
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1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भदोही (तत्कालीन मिर्जापुर) जिले का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आजादी की जंग में जिले के योगदान पर अध्ययन कर चुके डॉ. आदित्य नारायण मिश्र कहते हैं कि जिले का गोपीगंज क्षेत्र शुरू से ही अंग्रेजों का विरोधी रहा है। महाराजा चेतसिंह के समय में गोपीगंज की जनता ने कई बार अंग्रेजों को मार डाला था। यही वजह थी कि अंग्रेजों ने गोपीगंज बाजार के पश्चिम में अपनी छावनी बना ली थी। उस समय जिले के पाली गांव में सर जॉन रहता था। वहीं पर उसकी नील की विशाल फैक्ट्री थी। गोदाम और फैक्ट्री के अवशेष आज भी पाली में विद्यमान हैं।
बताते हैं कि सर जॉन क्षेत्र के किसानों को आए दिन कोड़े से पीटता था और फैक्ट्री में काम करने के लिए बाध्य करता था। शराब के नशे में अक्सर किसानों-मजदूरों की स्त्रियों के साथ दुराचार करता था। उसके अत्याचार से क्षेत्र की जनता त्रस्त हो गई थी। उसके इस व्यवहार से धीरे-धीरे जनता के मन में अंग्रेजों के प्रति नफरत पैदा होने लगी थी। सर जॉन के अत्याचारों से क्षेत्र की जनता को मुक्ति दिलाने के लिए अभोली गांव निवासी ठाकुर उदवंत सिंह ने विरोध का बिगुल फूंका। सर जॉन के विरोध में उन्होंने पाली और आसपास के गांवों के विद्रोह का नेतृत्व किया। फलस्वरूप चार, पांच जून 1857 को बनारस, इलाहाबाद और मिर्जापुर में एक साथ विद्रोह हो गया। उदवंत सिंह अंग्रेजों के लिए चुनौती बन गए। इस विद्रोह को दबाने के लिए जॉन ने अपने मित्र और मिर्जापुर के डिप्टी कलेक्टर मिस्टर मोर को पत्र भेजा। मित्र की रक्षा के लिए मिस्टर मोर 20 जून 1857 को सैनिकों के साथ गोपीगंज आया और योजना बनाकर क्षेत्र के ही कुछ देशद्रोहियों की मदद से क्रांतिकारी उदवंत सिंह को साथियों समेत पकड़ लिया और गोपीगंज ले जाकर पेड़ की डाल पर फांसी दे दी। इसके बाद, शहीद उदवंत सिंह की पत्नी ने प्रतिज्ञा की कि जब तक कोई मोर का कटा हुआ सिर लाकर उन्हें नहीं देगा, तब तक वह अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगी और स्वयं हथियार उठा लिया। उस समय तक नौजवान झूरी सिंह क्रांति का नेतृत्व संभाल चुके थे। यह खबर उन्हें मिली तो वह साथियों के साथ अभोली पहुुंचे और उदवंत सिंह की विधवा पत्नी को सांत्वना दी कि शीघ्र ही मोर का कटा हुआ सिर उनके कदमों में होगा। झूरी सिंह अभोली से सीधे पाली गोदाम पहुंचे और सर जॉन की कोठी को घेर लिया। कोठी के अंदर केवल मिस्टर मोर और फैक्ट्री के दो मैनेजर थे। झूरी सिंह ने मोर और दोनों मैनेजरों का सिर काट दिया। मोर का कटा सिर अपने साथी से उदवंत सिंह की पत्नी के पास भेजवा दिया। इसके बाद अंग्रेजी सरकार ने आठ अगस्त 1857 को झूरी सिंह को गिरफ्तार करने के लिए इनाम की घोषणा की। लेकिन, इससे पूर्व ही झूरी सिंह जौनपुर की तरफ चले गए थे।
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