फैसला आने के कई दिन पहले जिस संजरपुर गांव में बटला कांड के आरोपियों के लिए घरों और मस्जिदों में दुआएं मांगी जा रही थीं, फैसले के बाद उसने खामोशी ओढ़ ली थी।
आरोपियों के घरों के दरवाजे भी बंद थे और मोबाइल भी। इस गिरफ्त से मुक्त थे तो बस दो आरोपियों सैफ के पिता शादाब अहमद उर्फ मिस्टर।
शादाब ने बतायाय, ‘हम लड़ाई पूरी तरह से नहीं हारे हैं। हमें बड़ी अदालतों और अल्लाह पर पूरा भरोसा है। इंसाफ एक दिन तो मिलेगा ही, देर से ही सही।’
दिल्ली बम विस्फोट और बटला कांड को लेकर इस गांव के नौ लड़कों पर गंभीर आरोप लगे हैं। इनमें दो साजिद और आतिफ बटला कांड में पुलिस से मुठभेड़ में मारे गए थे।
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गांव में लोग खामोशी के साथ टीवी पर नजरें गड़ाए थे। जैसे ही ब्रेकिंग न्यूज के साथ शहजाद को दोषी करार संबंधी खबर प्रसारित हुई, खामोशी और तेजी से पसर गई।
फैसले के बाद दस लड़कों और चार लड़कियों के पिता शादाब अहमद ने कहा कि ‘इस फैसले से वह बेहद दुखी हैं। फिर भी अदालत का फैसला सर माथे। हम इस फैसले के खिलाफ ऊंची अदालतों में जाएंगे। हमें पूरा भरोसा है कि बड़ी अदालतों से हमें इंसाफ मिलेगा।’
बटला हाउस में पुलिस की गोली से मारे गए साजिद के पिता अंसारुल हस्सान ने इस मसले पर बात करने से इनकार कर दिया।
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बटला हाउस में पुलिस मुठभेड़ में मारे गए आतिफ के परिवार वाले तो घटना के बाद संजरपुर छोड़ सरायमीर बस गए हैं।
मगर संजरपुर के ही निवासी व रिहाई मंच के तारिक शफीक बेहद गुस्से में मिले। उन्होंने कहा कि इस फैसले से पूरा संजरपुर मर्माहत है।