बस्ती। बारातघर और बैंक्वेट हॉल में इन दिनों सजावट, संगीत और मेहमानों की भीड़ तो है, पर इसी चकाचौंध के पीछे ऐसी कड़वी सच्चाई भी छिपी है, जिसका वास्ता सीधे भूख से है। शादी-ब्याह में इतना भोजन बर्बाद हो रहा है, जिससे सैकड़ोंं लोगों का पेट भर जाए। हर सीजन में शहर में औसतन 1200 से अधिक शादियां होती हैं।
एक ओर दावतों में डोंगे खाली होते देख मेजबान की सांसें अटक जाती हैं, वहीं दूसरी ओर टेंट के पीछे बीस से ज्यादा डस्टबिन आधे खाए व्यंजनों से भरते जाते हैं। कहीं ठंडी बिरयानी पड़ी है, कहीं अधखाया गुलाब जामुन और सूखती पूरियां। खुशियों की इन रातों के पीछे हर आयोजन में यही सच्चाई दोहराई जा रही है। वहीं, यदि एक भी पूरी कम पड़ जाए तो मेजबान को मुंह छिपाने की नौबत आ जाती है।
सफाई विभाग के मुताबिक इन महीनों में गीले कचरे की मात्रा सामान्य दिनों से 25 प्रतिशत अधिक हो जाती है। यानी, कूड़े के ढेर में सिर्फ फूल-माला या टेंट का सामान नहीं, बल्कि ऐसा भोजन भी शामिल होता है जो कई गरीबों के पेट भर सकता था। समाजशास्त्री डॉ. रघुवर पांडेय बताते हैं, एक औसत शादी में करीब 50 किलो तक खाना बच जाता है, जो लगभग 250 लोगों का पेट भर सकता है।
जिले की सभी शादियों में यह मात्रा जोड़ें तो करीब 50 टन भोजन कचरे में जाता है, जो 1.25 लाख लोगों का पेट भरने के बराबर है। गायत्री मंदिर के परिब्राजक राम प्रसाद त्रिपाठी बताते हैं, हमारी संस्कृति में भोजन को ‘अन्न देवता’ कहा गया है, लेकिन आज यही अन्न सम्मान की जगह कूड़ेदानों में फेंका जा रहा है।
जागरूकता और योजना से बदलेगी तस्वीर : सामाजिक कार्यकर्ता भावेश पांडेय कहते हैं, थोड़ी सी सजगता से बड़ी तस्वीर बदली जा सकती है। शादी आयोजकों को यह समझना होगा कि दिखावा और प्रतिस्पर्धा के बीच वे अनजाने में कितना बड़ा नुकसान कर रहे हैं। यदि प्रत्येक आयोजन में ‘फूड रिस्क्यू’ की व्यवस्था हो। यानी अतिरिक्त भोजन को एनजीओ या सामाजिक संस्थाओं को सौंप दिया जाए,तो कई भूखे पेटों को अन्न मिल सकता है। यदि इस भोजन को समय पर अलग कर दिया जाए, तो इसे खाद्य उपयोग या ऑर्गैनिक कंपोस्ट में बदला जा सकता है।