यकीन नहीं होगा, मगर यह बिल्कुल सही है कि चूहे और छछुंदर भी एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी एईएस के कारक हैं। इनमें पाए जाने वाली किलनी में एईएस के वायरस पाए गए हैं। शाम के समय यह किलनी सक्रिय होकर उड़ती है और जिसे भी डंक मारती है, उसके शरीर में एईएस के विषाणु प्रवेश कर जाते हैं।
अब तक प्रदूषित पानी, गंदगी, झाड़-झंखाड़ से एईएस के कारक पाए गए थे, मगर एक नए शोध में स्वास्थ्य विभाग ने इस रोग का कारक चूहे और छछुंदर को भी बताया है। शोध के अनुसार चूहा और छछुंदर में जेई के लक्षण जैसे रोग के विषाणु पाए गए हैं। जब यह किलनी किसी मानव को डंक मार देती है तो विषाणु और तेेजी से सक्रिय होकर एईएस फैलाता है।
स्वास्थ्य विभाग की मानें तो चूहे और छछुंदर में पाई जानी वाली किलनी दिन भर निष्क्रिय होती है, लेकिन शाम होते ही यह सक्रिय होकर उड़ती है। चूंकि यह ज्यादा ऊंचाई तक नहीं उड़ सकती है ऐसे में वह पैर तथा अन्य खुले स्थानों पर डंक मारती है। इसके डंक से केवल मच्छर के काटने जैसी खुजली होती है। चूंकि चूहे, छछुंदर ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में झाड़-झंखाड़ में छिपे होते हैं और जब बच्चे खेलने अथवा लोग खुले में शौच के लिए जाते हैं तो यह किलनी उन पर हमला कर देती है, जिससे लोग बीमारी के शिकार हो जाते हैं।
सीएमओ डॉ जेएलएम कुशवाहा ने उक्त शोध की पुष्टि करते हुए कहा है कि चूहे और छछुंदर में एईएस के लक्षण वाली किलनी पाई गई है। ऐसे में इन्हें घर में न पनपने देने की सलाह सीएमओ ने दी है। उन्होंने यह भी कहा कि खुले में शौच से बचें। साथ ही शाम होते ही बच्चों तथा खुद के शरीर को कपड़ों से पूरी तरह ढक कर रखें। पैर में जूता, मोजा पहनें ताकि किलनी से बचाव हो सके।