नवजात की हालत बिगड़ने पर महिला अस्पताल से लेकर भागना मजबूरी
एसएनसीयू, पीआईसीयू जैसे वार्डों की नहीं बढ़ी क्षमता, संसाधन भी पर्याप्त नहीं
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। सरकारी अस्पतालों में बच्चों के उपचार की मुकम्मल व्यवस्था नहीं बन पा रही है। नवजात को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ने पर रेफर करना पड़ रहा है। संख्या बढ़ने पर सी-पैप, वाई- पैप मशीनें भी कम पड़ जा रही हैं। ऐसे में बच्चे को खतरे से बाहर निकालने के लिए परिजन निजी अस्पतालों के आईसीयू वार्ड में महंगे दर पर भर्ती कर रहे हैं।
नौ महीने से कम अवधि पर जन्म लेने वाले नवजात अक्सर गंभीर स्थिति में चले जाते हैं। उन्हें खतरे से बाहर निकालने के लिए तत्काल आईसीयू जैसी व्यवस्था की जरूरत पड़ती है। जिला महिला चिकित्सालय में ऐसे शिशुओं के लिए एसएनसीयू वार्ड की स्थापना एक दशक पहले हुई है। इसमें शून्य से 28 दिन तक के बच्चे भर्ती किए जाते हैं। लेकिन इसकी क्षमता और संसाधनों में बहुत इजाफा नहीं हो सका।
एक साथ 17 बच्चों को ही भर्ती करने की व्यवस्था यहां है। अस्पताल में सीजर और नार्मल मिलाकर प्रतिदिन 25 से 30 डिलीवरी हो रही है। इसमें दो से तीन बच्चों की स्थिति खराब मिलती है। उन्हें खतरे से बाहर निकालने के लिए एसएनसीयू वार्ड में पहुंचाया जाता है। कभी बेड न खाली होने की वजह से तो कभी वेंटिलेटर न होने की वजह से कुछ नवजात रेफर कर दिए जाते हैं।
एसएनसीयू में नवजात को रखने के लिए वार्मर जार, सी-पैप और वाई पैप मशीन ही उपलब्ध है। सी-पैप और वाई-पैप मशीन के जरिये नवजात की सांस लेने की प्रक्रिया को चालू रखने में मदद ली जाती है। स्थिति और विषम बनती है तो वेंटिलेटर की जरूरत पड़ती है। यह व्यवस्था महिला अस्पताल में नहीं है।
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कैली में भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं
नवजात के लिए ओपेक चिकित्सालय कैली में भी एक दर्जन वेंटिलेटर की व्यवस्था है। मरीज बढ़ने पर यहां भी गंभीर स्थिति में नवजात को रेफर कर दिया जा रहा है। यहां कुछ सी-पैप, वाई-पैप मशीन में अक्सर खराब रहती है। इससे नवजात के इलाज में कठिनाई आ रही है। इसके अलावा जिला अस्पताल में एक से 14 साल तक के बच्चों के लिए पीआईसीयू वार्ड बनाए गए हैं। इसमें भी 20 से अधिक बच्चों को भर्ती करने की क्षमता नहीं है। यहां अधिकतर जेई, एईएस और हाईग्रेड फीवर से पीड़ित बच्चे भर्ती किए जा रहे हैं।
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कोट
आईसीयू वार्ड की व्यवस्था है। इसकी क्षमता बढ़ाए जाने के लिए पहल की जाएगी। फिलहाल इस व्यवस्था से काफी हद तक नवजात एवं अन्य बच्चों को खतरे से बाहर निकालने में सफलता मिल रही है।
-डॉ. आरएस दुबे, सीएमओ