बस्ती। गरीबी मिटाने और आत्मनिर्भरता बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू की गई माइक्रो फाइनेंस कंपनियों की समूह लोन व्यवस्था अब गरीब तबके के लिए मदद से ज्यादा मुसीबत का सबब बनती जा रही है। कंपनियां महिलाओं के समूह बनाकर छोटी रकम का कर्ज तो देती हैं, लेकिन किस्त न चुका पाने की स्थिति में एजेंटों की मनमानी और दबावपूर्ण वसूली गरीब परिवारों के लिए मानसिक और सामाजिक संकट खड़ा कर रही है।
माइक्रो फाइनेंस कंपनियां दावा करती हैं कि वे बैंकिंग प्रणाली से दूर ग्रामीण और गरीब परिवारों को आसान किस्तों पर लोन देकर स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की दिशा में मदद करती हैं। 20-25 महिलाओं का समूह बनाकर उन्हें 15 से 50 हजार रुपये तक का लोन दिया जाता है। शुरू में सब कुछ सहज लगता है लेकिन जैसे ही किसी महिला का व्यवसाय असफल होता है या आय घटती है, किश्तें जमा करना मुश्किल हो जाता है। यहीं से दबाव, धमकी और अपमान का सिलसिला शुरू होता है।
कलवारी, महादेवा के बेहिल, लालगंज के महसों, सोनहा भानपुर के नरखोरिया, कप्तानगंज सहित कई जिलों में ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जहां वसूली एजेंट सुबह-शाम गांव पहुंचकर उधारकर्ताओं के घरों पर चक्कर लगाते हैं, और किश्त न मिलने पर सार्वजनिक रूप से फटकार, अपमान या धमकी तक देते रहे। बाद में खुदकुशी जैसी घटना सामने आई तो लोग सन्न रह गए।
शहर के निकट सियरापार की समूह से जुड़ी एक महिला बताती हैं कि महिलाओं को समूह बैठकों में सबके सामने बेइज्जत किया जाता है ताकि बाकी सदस्य डरें और किस्तें जमा करें। कई बार एजेंट घर जाकर सामान उठाने या पति-बच्चों को धमकाने तक से बाज नहीं आते। यह प्रवृत्ति न केवल रिजर्व बैंक के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है, बल्कि मानवाधिकारों और महिला गरिमा के खिलाफ भी है। अक्सर कर्ज लेने वालों को यह तक नहीं बताया जाता कि ब्याज दर कितनी है या कुल रकम कितनी चुकानी होगी। कई मामलों में लोन के नाम पर अतिरिक्त शुल्क, बीमा और प्रोसेसिंग फीस काट ली जाती है, जिसकी जानकारी लाभार्थियों को नहीं होती।
पूर्वांचल में फैलती जा रही समस्या : समाजशास्त्री डॉ. रघुवर पांडेय बताते हैं कि बस्ती, सिद्धार्थनगर, गोंडा, बलरामपुर, श्रावस्ती, महाराजगंज समेत पूर्वांचल के कई जिलों में माइक्रो फाइनेंस वसूली एजेंटों की मनमानी की शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं। कई जगह थानों पर तहरीर दी गईं, लेकिन स्थानीय दबाव या जानकारी के अभाव में कार्रवाई नहीं हो पाती। कुछ मामलों में कर्ज न चुका पाने की शर्म और अपमान के चलते महिलाओं ने आत्महत्या जैसे कदम भी उठाए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कंपनियों की निगरानी और नियंत्रण कमजोर है, जिसके चलते वसूली का अनौपचारिक और मनमाना तंत्र सक्रिय हो गया है।