मानिकचंद। आस्था और दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे शारीरिक अक्षमता और आर्थिक तंगी भी बाधा नहीं बन सकी। साऊंघाट के पैड़ा खरहरा गांव के चौराहे पर दोनों पैरों से दिव्यांग बेचनलाल पिछले 40 वर्षों से मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कराते आ रहे हैं। खास बात यह है कि वह नवरात्र में पूजा-पाठ की व्यवस्था के लिए किसी से चंदा नहीं मांगते। अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रतिमा स्थापना से लेकर पूजन सामग्री तक का खर्च स्वयं उठाते हैं। बेचनलाल बताते हैं कि एक समय ऐसा भी था, जब उनके पास मां दुर्गा की प्रतिमा खरीदने तक के पैसे नहीं होते थे। तब वह बैसाखी के सहारे मिट्टी और पुआल जुटाकर खुद ही प्रतिमा तैयार करते थे। गरीबी और शारीरिक परेशानी के बावजूद उन्होंने अपनी आस्था को कमजोर नहीं पड़ने दिया। आज उनके द्वारा स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमा आसपास के करीब दर्जनभर गांवों के श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। नवरात्र में बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर मां के दरबार में माथा टेकते हैं।
इस धार्मिक आयोजन में उनकी पत्नी सुनीता देवी और ससुर बद्री प्रसाद का विशेष योगदान रहता है। बेटे दुर्गेश, नितेश और अखिलेश के साथ बहू बेबी और मित्र सोनू राज भी तन-मन-धन से सहयोग करते हैं। परिवार और मित्रों के सहयोग से चार दशक से यह परंपरा लगातार आगे बढ़ रही है।
ग्राम प्रधान सुभाषचंद निरंकारी ने बताया कि बेचनलाल बिना किसी से चंदा लिए अपने सामर्थ्य के अनुसार मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कराते हैं। उनका यह प्रयास सराहनीय है। उन्होंने बताया कि पहले दुर्गा पंडाल में वीसीआर, सीडी और एलसीडी के माध्यम से धार्मिक चलचित्र दिखाए जाते थे।