10 साल से ट्रैफिक सिग्नल को दुरुस्त कराने की चल रही कवायद
यातायात पुलिस और होमगार्ड जवानों को आवागमन बहाल रखने में करनी पड़ रही कसरत
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। शहर में लगे ट्रैफिक सिग्नल सिस्टम 10 साल से संचालित नहीं हो पा रहे हैं। इस बार भी यातायात माह बीत गया। मगर, किसी भी प्रमुख चौराहे पर यह व्यवस्था बहाल नहीं हो पाई। भीड़भाड़ वाले चौराहों पर यातायात पुलिस और होमगार्ड के जवानों की टीम पूरे दिन आवागमन सुचारू बनाने के लिए कसरत करती रहती है। जैसे ही चौराहों से पुलिस और होमगार्ड हट रहे हैं जाम लग जा रहा है। जाम से छूटकारा पाने के लिए लोगों को ठंड भी पसीना बहाना पड़ रहा है।
ट्रैफिक सिग्नल सिस्टम खराब होने से शहर में जाम की समस्या खत्म नहीं हो रही है। आवागमन का दबाव बढ़ते ही अस्पताल चौराहा पर जाम की स्थिति बन जाती है। यहां चौतरफा वाहनों की लंबी कतार लग जाती है। इसके चलते कुछ ही देर बाद रोडवेज भी जाम का शिकार बन जाता है। पांडेय बाजार में तो दिन में कई बार जाम लग रहा है। कंपनीबाग चौराहे पर भी मनमाने ढंग से वाहन निकलने के दौरान जाम की समस्या खड़ी हो रही है।
शहर की आबादी और वाहनों की संख्या में लगातार इजाफा होने से मंडल मुख्यालय पर करीब दो दशक से यातायात का भार अधिक महसूस किया जा रहा है। वर्ष 2013 में नगर पालिका की तरफ से प्रमुख चौराहों पर ट्रैफिक सिग्नल सिस्टम की व्यवस्था की गई। कंपनीबाग, नेहरू तिराहा, रोडवेज तिराहा, जिला अस्पताल चौराहा, पांडेय बाजार जैसे प्रमुख स्थल चिह्नित हुए। यहां सोलर पैनल पर आधारित ट्रैफिक सिग्नल लगवाए गए। यातायात पुलिस की तैनाती होने लगी।
कुछ दिनों यह व्यवस्था संचालित हुई तो यातायात व्यवस्था में काफी सुधार नजर आया। एक पुलिसकर्मी से ही यातायात व्यवस्था आसानी से संभलने लगी। सिग्नल के हिसाब से वाहन चलाने को लोग बाध्य हो गए। इससे ट्रैफिक जंक्शन पर वाहनों का बेतरतीब फंसे रहना बंद हो गया। मगर, ट्रैफिक सिग्नल की देखभाल न होने से यह एक-एक कर खराब होते गए। पिछले 10 साल से सभी ट्रैफिक सिग्नल सिस्टम ने काम करना बंद कर दिए हैं।
उम्मीद थी कि यातायात माह में प्रशासन की नजर इस ठप हो चुकी व्यवस्था पर जरूर पड़ेगी। मगर, पूरी कवायद विद्यालयों में आयोजन और सड़क पर जागरूकता अभियान चलाने तक ही सिमट कर रह गया। भीड़भाड़ वाले चौराहों पर यदि यातायात पुलिस और होमगार्ड पांच से सात की संख्या में तैनात न हों तो यातायात व्यवस्था बिगड़ने में देर नहीं लगती है। इस वजह से जाम का संकट खड़ा हो रहा है।
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कंपनी का नहीं हुआ था भुगतान
पांच स्थलों पर लगाए गए ट्रैफिक सिग्नल की लागत 25 लाख रुपये आंकी गई थी। सिग्नल व्यवस्था चालू करने के बाद तीन साल तक देखरेख करने का जिम्मा संबंधित कंपनी के पास ही थी। मगर, नगर पालिका की ओर से भुगतान नहीं किया गया। इसीलिए कंपनी ने देखरेख से हाथ खींच लिए। इसके बाद इसे ठीक कराने की पहल नहीं की गई। इतना ही नहीं, पिछले साल एक दर्जन प्रमुख स्थानों पर यातायात पुलिस के लिए लोहे के जालीदार बूथ रखवाए गए। इस पर करीब 12 लाख रुपये खर्च हुए। मगर, यह बैठने के लिहाज से काफी छोटा है। इससे किसी भी चौराहों पर यातायात पुलिस इन बूथों पर नजर नहीं आ रही है। यातायात माह के दौरान भी बड़ेवन, रोडवेज, पांडेय बाजार, कंपनीबाग पर रखे गए यह बूथ खाली नजर आ रहे हैं।
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कोट
ट्रैफिक सिग्नल सिस्टम ठीक कराने के लिए नगर पालिका से पत्राचार कई बार किया गया है। इसके अलावा मुख्य चौराहों से अतिक्रमण हटाने के लिए पत्र लिखा गया है। यदि यह सिस्टम ठीक हो जाए तो आवागमन बहाल करने में आसानी हो जाएगी।
-अवधेश तिवारी, प्रभारी यातायात