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Basti News: बाहर विशेषज्ञ डाॅक्टर का बोर्ड....अंदर जुगाड़ से हो रहा इलाज

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बस्ती। निजी हॉस्पिटल पर यूं आंख मूंदकर भरोसा करना ठीक नहीं है। लकदक भवन और प्लस के निशान वाले आकर्षक बोर्ड पर मत जाइए। यह भ्रमित करने वाले हो सकते हैं। पहले पता करिए कि अंदर आपके असाध्य रोगों से संबंधित योग्य चिकित्सक हैं या सिर्फ मार्बल, टाइल्स, व्हीलचेयर और रिसेप्शनिस्ट तक की ही व्यवस्था है। यदि ऐसा हैं तो आप धोखा खा जाएंगे।
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चिकित्सा सेवा की आड़ में निजी अस्पताल भी एक धंधा बन गया है। शहर में कई ऐसे बहुमंजिला इमारत में तथा कथित सुपरस्पेशलिटी, मल्टीस्पेश्यलिटी के नाम से निजी हॉस्पिटल संचालित किए जा रहे हैं। मेडिकल एक्ट में आसानी से पंजीकृत होने वाले 50 बेड तक के ज्यादातर अस्पताल खोले गए हैं। कुछ अस्पतालों के संचालक तो बिना चिकित्सीय डिग्री वाले हैं।
वहीं कुछ लोग साधारण परामर्श दाता की डिग्री पर मल्टीस्पेश्यलिटी हॉस्पिटल चला रहे हैं। इन अस्पतालों में पेशागत ढंग से ओपीडी, भर्ती वार्ड, आईसीयू वार्ड, रिसेप्शन काउंटर, स्ट्रेचर, व्हील चेयर, लिफ्ट, मरीजों एवं तीमारदारों के लिए प्रतीक्षालय आदि की व्यवस्था तो बनाई गई है। मगर विभिन्न रोगियों के मुकम्मल इलाज के योग्य चिकित्सक नहीं हैं।
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बुधवार को शहर के एक निजी हॉस्पिटल में घटित एक घटना ने स्वास्थ्य महकमे से लेकर निजी हॉस्पिटलों के मल्टीस्पेश्यलिटी होने पर फिर सवाल खड़ा कर दिया है। संतकबीरनगर जिले के बेलहर कला थाना क्षेत्र के फुलवरिया गांव के रहने वाले प्रधान सालिक राम चौधरी ह्दयघात के मरीज थे। परिजनों के अनुसार उनका इलाज पहले लखनऊ में चलता था। 6 मार्च को तकलीफ बढ़ी तो कटरा स्थित एक निजी हॉस्पिटल में ह्दय रोगियों का इलाज होने की बात सुनकर लाया गया।
अस्पताल प्रबंधन ने उन्हें आईसीयू में भर्ती कर लिया। खबर हैं कि उनका इलाज कार्डियोलॉजी की देखरेख में न होकर एक मेडिसिन से संबंधित चिकित्सक द्वारा किया जा रहा था।
मरीज की बुधवार की सुबह मौत होने के बाद परिजनों ने जमकर हंगामा किया। पुलिस ने बीच-बचाव कर मामला शांत कराया। इतने के बाद भी विभागीय अमला संबंधित हॉस्पिटल पर किसी ठोस कार्रवाई के लिए आगे नहीं आया।
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