बरेली। दिल है छोटा सा, छोटी सी आशा मस्ती भरे मन की, भोली सी आशा, चांद तारों को छूने की आशा, आसमानों में उड़ने की आशा... इस गाने की तरह इन बेटियों की तमन्ना भी कुछ ऐसी ही है। इनमें से किसी के पिता ऑटो चलाते हैं, किसी के घर का खर्च दूध बेचकर चलता है, तो किसी के पिता मानसिक बीमारी से जूझ रहे हैं, लेकिन इन बच्चियों का जज्बा इन मुश्किलों से कहीं बड़ा है। ट्रेनिंग की कमी, संसाधनों का अभाव और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच भी ये बालिकाएं रोजाना एथलेटिक्स और बैडमिंटन, जूडो का अभ्यास कर रही हैं और अपने सपनों को पंख देने में जुटी हैं।
अभिभावक करते हैं सहयोग
बिहारीपुर निवासी 13 वर्षीय खुशी एथलेटिक्स की खिलाड़ी हैं। पिता ऑटो चलाकर परिवार का गुजारा करते हैं। घर की सीमित आय के बावजूद माता-पिता ने कभी उनके सपनों पर रोक नहीं लगाई। ट्रेनिंग की फीस देना संभव न होने के कारण खुशी अपने घर के पास ही सड़क पर अभ्यास करती हैं। वह सुबह जल्दी उठकर रनिंग और स्ट्रेचिंग करती हैं। खुशी का कहना है, अभाव उनके खेल में बाधा नहीं बन सकता। वह प्रतिदिन अभ्यास करती हैं, ताकि सपना हकीकत में बदल सके।
मां हैं बेटी की प्रेरणा
14 वर्षीय मनु एथलेटिक्स और जूडो दोनों खेलती है। पिता दूध बेचते हैं और स्टेडियम की फीस देना उनके लिए संभव नहीं है। मनु बताती है कि पिता खेल के पक्ष में कम रहते हैं, लेकिन उनकी मां सबसे बड़ी प्रेरणा हैं। खेल में महारत हासिल करने के लिए रोज सुबह चार बजे अभ्यास के लिए उठती हैं। अब तक तीन बार प्रदेश स्तर पर खेल चुकीं मनु कहती हैं कि मेहनत ही उनका हथियार है। मां का भरोसा हर दिन और मजबूत बनाता है। मेरा सपना भारत के लिए पदक जीतना है।
प्रदेशस्तरीय खिलाड़ी हैं नीति
करगैना निवासी 14 वर्षीय नीति प्रसाद बैडमिंटन और जूडो दोनों खेलों की प्रदेशस्तरीय खिलाड़ी हैं। उनके पिता मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं, इसलिए घर की पूरी जिम्मेदारी उनकी मां पर है। मां एक किराने की दुकान में काम करती हैं और उसी से परिवार की जरूरतें पूरी होती हैं। नीति बताती है मां ने कभी उन्हें रुकने नहीं दिया। कहा कि चाहे मां को खुद मेहनत करनी पड़े, लेकिन वह हमेशा कोशिश करती हैं कि मुझे खेल के लिए जरूरी सामान मिल सके। पैसों की तंगी के बावजूद नीति खेलों में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रयासरत हैं।