बरेली मंडल में पिछले 75 साल में सात लोकसभा सीट से सिर्फ पांच मुस्लिम चेहरे ही संसद पहुंच पाए। अंतिम बार वर्ष 2009 में लखीमपुर खीरी से जफर अली नकवी सदन पहुंचे थे। सियासी दलों ने तो भरोसा जताया, लेकिन मतदाताओं को प्रत्याशी रिझा नहीं सके।
दुनिया भर में भले ही बरेली की पहचान मुस्लिम सियासत के मरकज के रूप में है, मगर बरेली मंडल और इसके आसपास की लोकसभा सीटों से आजादी के बाद अब तक महज पांच मुसलमान सांसद ही चुने गए हैं। राजनीतिक दलों ने तो दिल खोलकर मुस्लिम चेहरों पर भरोसा जताया, लेकिन वे यहां के मतदाताओं को रिझा नहीं सके।
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आजादी के बाद से अब तक बरेली, बदायूं, पीलीभीत और लखीमपुर खीरी का प्रतिनिधित्व करने के लिए ही पांच मुस्लिम चेहरे दिल्ली तक पहुंच पाए। वहीं आंवला, शाहजहांपुर और धौरहरा लोकसभा सीट से मुस्लिम उम्मीदवारों ने भाग्य तो खूब आजमाया, लेकिन मतदाताओं को अपने पक्ष में नहीं कर सके।
अंतिम बार 15 वर्ष पहले लखीमपुर खीरी से जफर अली नकवी कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की थी। इसके बाद बरेली मंडल ओर आसपास की लखीमपुर खीरी व धौरहरा सीट से कोई मुस्लिम चेहरा सदन तक नहीं पहुंच पाया है।
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बरेली लोकसभा सीट से पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की पत्नी बेगम आबिदा भी सांसद रह चुकी हैं। यहां की जनता ने उन्हें वर्ष 1981 और 1984 में दो बार अपनी आवाज बुलंद करने के दिल्ली भेजा। इससे पहले वर्ष 1980 में जनता पार्टी के मिसरयार खां भी बरेली से सांसद चुने जा चुके हैं।
सात लोकसभा सीट में पहली बार वर्ष 1977 में पीलीभीत सीट से जनता पार्टी के मोहम्मद शम्सुल हसन खान ने जीत दर्ज की थी। हालांकि, उनकी सियासत ज्यादा लंबी नहीं चली और वर्ष 1980 में कांग्रेस के हरीश कुमार गंगवार ने उन्हें परास्त कर दिया। इसके बाद पीलीभीत सीट पर मुस्लिम चेहरे ने कभी जीत हासिल नहीं की।
चार दशक तक सियासत के चेहरे रहे सलीम शेरवानी
बदायूं से पांच बार के सांसद रहे सलीम इकबाल शेरवानी ने अपनी मजबूत पकड़ के चलते पूरे देश के मुस्लिम चेहरे के रूप में अपनी पहचान बनाई। बदायूं में पहली बार वर्ष 1980 में मोहम्मद असरार अहमद कांग्रेस के टिकट पर संसद पहुंचे।
इसके बाद वर्ष 1984 में सलीम इकबाल शेरवानी ने इस सीट पर कब्जा जमाया, लेकिन अगले ही चुनाव में वर्ष 1989 में जनता दल के शरद यादव ने उन्हें पटखनी दे दी। हालांकि वर्ष 1996 में सलीम इकबाल शेरवानी ने वापसी की और लगातार चार बार जीत दर्ज कर अपनी ताकत का एहसास कराया।
कई दिग्गजों ने आजमाया भाग्य
इस क्षेत्र से संसद पहुंचने के लिए कई दिग्गज मुस्लिम चेहरों ने समय-समय पर भाग्य आजमाया, लेकिन उनकी हर कोशिश नाकाम साबित हुई। अकबर अहमद डंपी भी बरेली से चुनाव लड़कर हार का स्वाद चख चुके हैं। फिलहाल बसपा ने आंवला से आबिद अली, पीलीभीत से अनीस अहमद खां सहित कई मुस्लिम चेहरों को मौका दिया है। हालांकि इस चुनाव के परिणाम से इस क्षेत्र की मुस्लिम सियासत का फैसला होगा।
सबसे पहले पीलीभीत, अंतिम पर खीरी से मिली जीत
मुस्लिम प्रत्याशियों की बात करें तो सबसे पहली सफलता पीलीभीत लोकसभा सीट से 47 वर्ष पहले मिली थी। बदायूं में 20 साल पहले तक सलीम इकबाल शेरवानी जीतते आ रहे थे। हालांकि वर्ष 2004 के बाद से वहां मुसलमान प्रत्याशियों को हार का ही सामना करना पड़ रहा है। खीरी में 15 साल पहले मुस्लिम प्रत्याशी को जीत नसीब हुई थी।