बरेली। करोड़ों का बजट खर्च होने के बावजूद धूल फांक रहे तीन सौ बेड अस्पताल परिसर में ट्रामा सेंटर निर्माण की कवायद शुरू हो गई है। ओपीडी के सामने खाली मैदान में निर्माण के लिए नापजोख में भूमि कम मिली। ऐसे में सड़क को शिफ्ट करने की तैयारी है। इसके लिए शासन से अनुमति ली जाएगी।
बरेली में दुर्घटना में घायल होने वालों के इलाज के लिए कोई सरकारी ट्रामा सेंटर नहीं है। जिले की किसी भी तहसील में कोई व्यक्ति दुर्घटनाग्रस्त हो तो स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र उसे जिला अस्पताल रेफर कर देते हैं। यहां आईसीयू के अभाव में मरीज को हायर सेंटर रेफर करना पड़ता है। कई बार तीमारदार अपने मरीज को निजी अस्पताल, मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराते हैं।
पिछले वर्ष अमर उजाला ने ट्रामा सेंटर निर्माण के लिए अभियान चलाया था। सांसद और विधायकों ने मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर ट्रामा सेंटर निर्माण के लिए मांग की थी। सीएमओ डॉ. विश्राम सिंह के मुताबिक तीन सितंबर को राजकीय निर्माण निगम की टीम ने भूमि की नापजोख की थी पर मानक से भूमि कम मिली। हालांकि, सड़क शामिल कर लें तो भूमि की अड़चन नहीं होगी। शासन को रिपोर्ट जल्द भेज देंगे।
ओपीडी के पोर्टिगो के पास से बना सकते हैं सड़क
राजकीय निर्माण निगम के अवर अभियंता सिकंदर के मुताबिक, तीन सौ बेड अस्पताल मानसिक चिकित्सालय की भूमि पर बना है। भवन को सड़क से घेरने का उद्देश्य अग्निकांड या आपदा की स्थिति में बेहतर रेस्क्यू का था। हालांकि, ट्रामा सेंटर निर्माण के बाद सड़क को अस्पताल की ओपीडी के सामने पोर्टिगो के पास शिफ्ट किया जाएगा। ब्यूरो
मानसिक अस्पताल प्रशासन ने भूमि देने से किया इन्कार
मौके पर भूमि कम मिलने पर अधिकारियों ने मानसिक चिकित्सालय प्रशासन से जरूरत के अनुसार भूमि लेने के लिए संपर्क किया तो उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। कहा कि पहले ही चिकित्सालय की भूमि का बड़ा हिस्सा लिया जा चुका है। बची हुई भूमि पर मानसिक मंदित लोगों के लिए जरूरी गतिविधियां की जाती हैं। लिहाजा, अब भूमि के संबंध में कोई समझाैता नहीं किया जा सकता।
धूल फांक रहे उपकरण, जर्जर होने लगी हैं दीवारें
तीन सौ बेड अस्पताल का निर्माण करीब 86 करोड़ की लागत से हुआ था। वर्ष 2018 में राजकीय निर्माण निगम ने बजट के अभाव में निर्माण कार्य स्थगित कर दिया था। कोरोना के दौरान शासन से बजट मिलने पर 2023 में इसे पूरा किया। अस्पताल का हस्तांतरण अभी नहीं हुआ है। यहां वेंटिलेटर, एचएफएनसी, ऑक्सीजन प्लांट आदि करोड़ों के उपकरण लगे हैं, जो अब धूल फांक रहे हैं।