बरेली। सफल होने का जज्बा ही किसी खिलाड़ी को महान बनाता है। अपनी जिद व जुनून के दम पर ही वह अपनी पहचान गढ़ते हैं। वे संसाधनों के मोहताज नहीं होते। विश्व एथलेटिक्स दिवस पर शहर की कुछ ऐसी ही प्रतिभाओं से आपको मिलवाते हैं जिन्होंने मुश्किल परिस्थितियों व आलोचनाओं को पीछे छोड़ पदक अपने नाम किए।
विश्व एथलेटिक्स दिवस हर साल सात मई को मनाया जाता है। एथलेटिक्स में 26 इवेंट होते हैं। हर इवेंट में फिटनेस बेहद जरूरी है। यह दिवस लोगों में फिटनेस को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है। साल 1996 में इस दिन अंतरराष्ट्रीय एमेच्योर एथलेटिक्स महासंघ की ओर से इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ एथलेटिक्स फेडरेशन की स्थापना की गई थी।
इज्जतनगर निवासी कुनाल चौधरी अंतरराष्ट्रीय बाधा दौड़ के खिलाड़ी है। वह पांच साल से रेलवे में वरिष्ठ लिपिक के तौर पर कार्यरत हैं। कुनाल की मां तारा चौधरी बेटे को डॉक्टर बनाना चाहती थीं, लेकिन साल 2014 में कुनाल ने खिलाड़ी बनने का मन बनाया। परिजनों ने समझाया कि उनकी खिलाड़ी बनने की उम्र निकल चुकी है। 2015 में उन्होंने दिल्ली में प्रदेश स्तरीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल कर सबकी बोलती बंद कर दी। वह अब तक दो अंतरराष्ट्रीय व नौ राष्ट्रीय पदक प्राप्त कर चुके हैं।
21 वर्षीय काजल छोटे से गांव लालपुर में रहती हैं। कक्षा सातवीं में जब उनको पीटी ऊषा के बारे में पता चला तो उनकी एथलेटिक्स में रुचि बढ़ी, लेकिन आर्थिक परिस्थितियां सपनों की राह में बाधा बन गई। वह प्रशिक्षण के दौरान अपना खर्चा खुद उठातीं। सात साल की मेहनत के बाद उनका चयन आगामी खेलो इंडिया विश्वविद्यालय एथलेटिक्स प्रतियोगिता में हो गया है। इससे पहले उन्होंने लखनऊ विवि में हुई क्रॉस कंट्री में स्वर्ण पदक हासिल किया था। वह राष्ट्र व प्रदेश स्तर पर 10 से अधिक पदक जीत चुकी हैं।
सुभाष नगर की 20 वर्षीय शिवा त्रिपाठी जब सातवीं कक्षा में थी तो उन्होंने स्कूली एथलेटिक्स प्रतियोगिता में बिना तैयारी के स्वर्ण पदक हासिल किया था। इस पर भी घर में लोगों ने कोई रुचि नहीं ली। शिवा ने अपनी जिद पर स्टेट प्रतियोगिता की तैयारी शुरू की और देखते ही देखते आठ से दस पदक जीत लिया। उनका हाल ही में उत्तर प्रदेश पुलिस सेवा में चयन हुआ है। इसमें पूरे देश से उत्कृष्ट खिलाड़ियों ने भाग लिया था, लेकिन प्रदर्शन के चलते केवल दो का चयन हुआ, जिसमें शिवा शामिल थीं।
बड़ा बाजार की 17 वर्षीय ऋदम स्पेशल खिलाड़ी हैं। वह बोल नहीं सकती, लेकिन इतना तेज दौड़ती है कि किसी को बोलने का मौका ही नहीं देतीं। उनकी मां पूनम बताती हैं कि जब ऋदम छोटी थीं तो टीवी पर क्रिकेट और फुटबॉल देख बेहद खुश होती थीं। परिवार उनकी कमजोरी के कारण उनको खेलों में भेजने से कतराता था। यह उनका जज्बा ही था कि रोज सुबह छह बजे ग्राउंड पर प्रशिक्षण के लिए अकेले चल देती थीं। हाल ही में इंदौर में हुई नेशनल प्रतियोगिता में उन्होंने तीन स्वर्ण पदक अपने नाम किए।