मुआवजा का ब्योरा भी गायब, जमीन अधिग्रहण किन शर्तों पर, इसका भी खुलासा नहीं
बरेली। करीब सवा माह से रबर फैक्टरी जमीन की जांच कर रहे सदर तहसील प्रशासन ने रिपोर्ट तैयार कर एसडीएम को सौंप दी है। इसमें सिस्टम की मिलीभगत और लापरवाही सामने आई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 31.40 एकड़ जमीन फैक्टरी खातों में दर्ज है लेकिन इसका अंतरण विलेख नहीं है। इसके साथ ही बड़ा बाईपास प्रोजेक्ट में अधिकृत 14.31 एकड़ भूमि का उल्लेख तो है लेकिन यह नहीं दर्शाया है कि इसका मुआवजा किसे मिला? रिपोर्ट में इसका उल्लेख भी नहीं है कि फैक्टरी को किन शर्तों पर जमीन उपलब्ध कराई गई थी।
रबर फैक्टरी जमीन फिर से वापस लेने की पैरवी पिछले कई वर्षों से चल रही है लेकिन सिस्टम की लापरवाही से बॉम्बे हाईकोर्ट ने कीमती जमीन अल कैमिस्ट रि-कंस्ट्रशन कंपनी को सौंपने के आदेश दे दिए। फिर भी सिस्टम नहीं जागा, इसका खुलासा अमर उजाला ने किया तो केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार ने नाराजगी जताते हुए मामला शासन तक पहुंचाया। इसके बाद ही मंडलायुक्त ने फैक्टरी जमीन की नापजोख शुरू कराई और शर्तों आदि का ब्योरा मांगा। इसके बाद ही सदर तहसील प्रशासन ने इसकी जांच करने के लिए दर्जन भर लेखपाल लगाए और करीब सवा माह बाद अपनी आधी अधूरी रिपोर्ट तैयार कर सौंप दी। तहसीलदार आशुतोष गुप्ता ने बताया कि रिपोर्ट भेज दी गई है, मगर इसमें क्या पाया, मैं इसे बारे में कुछ बता नहीं सकता।
तहसील प्रशासन की जांच में रबर फैक्टरी को लेकर कई गंभीर बिंदु सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 31.40 एकड़ जमीन का उल्लेख भी अंतरण विलेख में नहीं है लेकिन यह जमीन रबर फैक्टरी के नाम दर्ज मिली है। इसी तरह की कई और गड़बड़ियां भी सामने आई हैं। जांच में सामने आया है कि दो मई 1961 को उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के नाम से एवं मैसर्स सिंथेटिक एंड कैमिकल्स लिमिटेड कंपनी (रबर फैक्टरी) के मध्य अंतरण विलेख यानी डीड ऑफ ट्रांसफर हुआ। तहसील मीरगंज के गांव भिटौरा नौगंवा उर्फ फतेहगंज पश्चिमी व कुरतरा और सदर तहसील के गांव माधोपुर माफी व रुकुमपुर चारों राजस्व गांव की तीन लाख नौ हजार पांच सौ चौवन रुपये में 1380.23 एकड़ जमीन फैक्टरी को दी गई है। इस रिकॉर्ड के अनुसार यह भी सामने आया है कि तहसील सदर के राजस्व गांव माधोपुर माफी के काश्तकारों की 137.75 एकड़ और ग्राम समाज की 149.62 एकड़ भूमि भी ली गई है। इसके अलावा माधौपुर माफी व रुकुमपुर के निजी काश्तकारों से 153.69 एकड़ और ग्राम समाज की कुल 156.03 एकड़ जमीन की खरीद मिली है। जिसमें 1967 में एसडीओ द्वितीय ने इस जमीन को लेकर नामांतरण के आदेश पारित किए हैं। जांच में यह भी सामने आया है कि वर्तमान राजस्व ग्राम माधोपुर माफी के अभिलेखों के मिलान के अनुसार ग्राम समाज की भूमि के कुल गाटे 10 के रकबा 12.709 हेक्टेयर यानी 31.40 एकड़ जमीन का उल्लेख अंतरण विलेख में नहीं है लेकिन यह जमीन रबर फैक्टरी के नाम दर्ज मिली है। इसी तरह अंतरण विलेख में राजस्व गांव माधोपुर माफी के कुल गाटा संख्या 42 का कुल रकबा 4.138 हेक्टेयर व ग्राम रुकुमपुर के गाटा संख्या 21 के कुल रकबा 1.654 हेक्टेयर है। इस दोनों गांवों का यह कुल रकबा 5.792 अर्थात 14.31 एकड़ है, जोकि रबर फैक्टरी की भूमि राष्ट्रीय राजमार्ग के नाम दर्ज है।
मगर पूरी रिपोर्ट में यह उल्लेख नहीं है कि तत्कालीन प्रशासन ने किसानों से 1380.23 एकड़ जमीन खरीदकर फैक्टरी को किस शर्तों पर दी। राज्यपाल और रबर फैक्टरी प्रबंधन के बीच जो डीड ऑफ ट्रांसफर तैयार हुई, उसका भी ब्योरा नहीं है। सिर्फ जानकारी बतौर यह बात एक लाइन में कही गई है। यही स्थिति राष्ट्रीय राजमार्ग (बड़ा बाईपास) के निर्माण में दी गई जमीन से मिला मुआवजा को लेकर है। मुआवजा फैक्टरी को मिला या प्रशासन ने सरकारी खाते में जमा कराया, इसे भी स्पष्ट नहीं किया है।
यह है मामला
करीब 21 साल से बंद पड़ी सिंथेटिक एंड केमिकल्स रबर फैक्टरी प्रकरण में प्रभावी पैरवी नहीं होने से बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा अल केमिस्ट रि-कंस्ट्रशन कंपनी को आठ सप्ताह में जमीन और अन्य संपत्ति सौंपने का आदेश दे दिया था। पैरवी नहीं होने और लापरवाही बरतने पर शासन ने नाराजगी जताई तब अभिलेख खंगाले गए हैं। वर्ष 1959 में किसानों के लिए नाम भूमि रबर फैक्ट्री के नाम कैसे दर्ज हो गई? कलेक्ट्रेट और जिला राजस्व अभिलेखागार में संबंधित सभी खतौनियों के साथ दूसरे रिकॉर्डों की जांच चल रही है। इसकी जांच मंडलायुक्त रणवीर प्रसाद करा रहे हैं।