बरेली। चैत्र नवरात्र के पहले दिन मंदिरों में भक्त सुबह 5 बजे से ही पूजा-अर्चना करने के लिए पहुंच गए। मंदिरों में भक्तों की कतार देखने को मिलीं।
मंदिरों और घरों में विधि विधानपूर्वक कलश स्थापना कर माता के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री की पूजा की गई। बताशे, मिष्ठान, कपूर, अगरबत्ती से थाल को सजाकर मंदिरों में देवी पूजन के लिए लोग पहुंचे।
मां शैलपुत्री को शृंगार का सामान अर्पित कर श्रद्धालुओं ने सुख संपत्ति की कामना की। पंडित मुकेश मिश्रा ने बताया कि माता शैलपुत्री का यह रूप सती, पार्वती, दुर्गा, उमा, अपर्णा, गौरी, माहेश्वरी, शिवांगी, शुभांगी, पर्वतवासिनी जैसे कई नामों से प्रसिद्ध है। पूर्व जन्म में इनके पिता राजा दक्ष थे।
राजा दक्ष ने यज्ञ किया, लेकिन दामाद शिव को नहीं बुलाया। सती भगवान शंकर की स्वीकृति के बिना पिता के यहां चली गईं। यज्ञ स्थल पर अपने तिरस्कार एवं शिव का आसन न देखकर कुपित सती यज्ञाग्नि में कूद पड़ीं।
इससे शिव की समाधि भंग हुई तो उन्होंने वीरभद्र नाम के गण को भेजा। वीरभद्र ने यज्ञशाला का विध्वंस किया और सती के जलते शरीर को लेकर चल पड़ा। सती के अंग जहां-जहां गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ स्थापित की गई।
सती का अगला जन्म शैलराज की पुत्री पार्वती के रूप में हुआ। पार्वती की घोर तपस्या के बाद शिव ने उनका वरण किया। पर्वतराज की पुत्री होने के कारण माता के इस प्रथम रूप का नाम शैलपुत्री पड़ा। संवाद