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Bareilly News: हुनर बरकरार... कद्रदानों की बेरुखी से शहर में सिमट रहा कारोबार

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बरेली। फर्नीचर, प्लास्टिक, प्लाईवुड की चमक के बीच बरेली की परंपरागत बांस-बेंत कारीगरी फीकी पड़ रही है। दो दशक पहले बांस मंडी में सौ से ज्यादा कारोबारी थे। जो आधुनिकता की दौड़ में पीछे रह गए। कद्रदानों की बेरुखी से कारोबार सिमटने से अब यहां दो-तीन ही व्यापारी बचे हैं।
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हालांकि, कारोबार को बाजार के अनुरूप नया स्वरूप देने के लिए कारीगर कई आकर्षक उत्पाद बना रहे हैं। बांस मंडी के कारोबारियों के मुताबिक, ग्राहकों की मांग के अनुसार बांस-बेंत के गिफ्ट बास्केट, मिरर फ्रेम, लैंप शेड, कप-प्लेट, जग, मग, केतली, बोतल, गमले, साेफा, कुर्सी, टेबल, डायनिंग सेट, सजावटी सामान, वाॅल हैंगिंग आदि उत्पाद तैयार कर रहे हैं। बताया कि बांस मंडी में फर्नीचर कारोबार अब जगह बना चुका है। आरा मशीनें लग गई हैं। प्लाईवुड, फर्नीचर वर्क की कतार में बांस व बेंत का पारंपरिक उद्योग सिमटता चला जा रहा है।
आसिम के मुताबिक, बेंत के उत्पाद का अगर सही से रखरखाव हो तो सालों तक बरकरार रहते हैं। बेंत के उत्पादों से घर में अलग ही रौनक दिखती है। इन्हें बनाने में हाथों की कारीगरी का हुनर जरूरी है। मशीनों से बेंत के उत्पाद नहीं बनते। इसलिए कीमत फर्नीचर से ज्यादा होती है। ब्यूरो
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असम, त्रिपुरा से आता है बांस
राज्य दक्षता पुरस्कार से सम्मानित बांस-बेत कारोबारी नत्थू हुसैन के मुताबिक बरेली में जिस बांस की पैदावार है, उससे कारीगरी मुमकिन नहीं। इससे सीढ़ी, बल्लियां बनती हैं। इसलिए असम, त्रिपुरा से बांस मंगाया जाता है। बताया कि मिशन बैंबू के तहत नवाबगंज, फतेहगंज पश्चिमी के किसानों ने उच्च गुणवत्ता वाले बांस की खेती शुरू की है। जिले में असम, त्रिपुरा जैसे बांस मिलने पर उत्पाद भी सस्ते होने की उम्मीद जताई।


जिले में कहां-कहां बन रहे बांस-बेत उत्पाद
बांस मंडी के कारोबारी आसिम हुसैन के मुताबिक जिले में पुराना शहर, सीबीगंज, पदारथपुर, ठिरिया, उड़ला जागीर, आलमपुर, फतेहगंज पश्चिमी, नवाबगंज के गांवों में बांस के उत्पाद बनाए जा रहे हैं। जिले में बेंत से तैयार होने वाली बास्केट की मांग केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु में सर्वाधिक है। हैंडीक्राफ्ट मेलों से बांस-बेत कारोबार को सहारा मिला। यूरोप, फिलिपींस, डेनमार्क सहित अन्य देशों को भी उत्पाद निर्यात हो रहे हैं।

पर्यावरण संरक्षण में बांस का महत्व
- मिट्टी की ऊपरी परत में गिरती पत्तियां नमी का संरक्षण करती हैं।
- तेज बारिश की चोट से पत्तियां ढाल बनकर मृदा कटान रोकती हैं।
- कार्बन डाइऑक्साइड सोखकर, बंजर भूमि को उपजाऊ बनाते हैं।
- बांस में प्राकृतिक प्रदूषण को पौध पोषक में बदलने की क्षमता है।
- जैव विविधता समेत फसल की सुरक्षा में बांस की बाड़ कारगर है।
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तिलहर से बरेली आकर बांस के कारोबार में हुए सफल

बरेली। तिलहर से बरेली आकर बांस का काम किया। छोटे पैमाने से शुरुआत की थी, आज इसी से सब कुछ है हासिल किया। दूसरे शहरों तक से लोग माल लेने आते हैं। यह कहना है नरियावल के बांस कारोबारी अब्दुल राफे खान का।
उन्होंने कहा कि पिता रफी उल्ला खान ने बरेली में 2003 में इस काम को शुरू किया था। अब वह इस काम को संभाल रहे हैं। कहा कि इस काम में अब बहुत ज्यादा कमाई नहीं है। बरेली में तो अब कोई बांस की खेती करता ही नहीं। प्रदेश में सिर्फ सीतापुर में बांस का थोड़ा-बहुत उत्पादन होता है। बांस असम और बिहार से ही आता है।
उन्होंने कहा कि पहले बांस की बहुत खपत थी। जब से शटरिंग, चारपाई में लोहा और स्टील का इस्तेमाल होने लगा है बांस की खपत पर काफी फर्क पड़ा है। अलबत्ता बांस के फर्नीचर के चलन से थोड़ा खपत बढ़ी है। किसान नेता हाजी इकबाल खान एडवोकेट ने बताया कि बरेली में काफी अरसे से बांस की खेती बंद है। संवाद
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