बरेली। हिंदी साहित्यकार डॉ. नितिन सेठी का कहना है कि भाषा का अंकुरण और पल्लवन लोकमानस की उर्वरा भूमि में होता है। लोक व्यवहार में आकर भाषा का स्वरूप निरंतर निखरता और संवरता रहता है। हिंदी के साथ भी यही है।
डॉ. सेठी के अनुसार हिंदी हमारी जातीय संस्कृति की अभिव्यक्ति है। पिछले लगभग 1000 वर्षों से अपनी विभिन्न बोलियों-बानियों के माधुर्य के साथ हिंदी हमारे समाज-हमारी संस्कृति से जुड़ी रही है और इसे खाद-पानी भी देती रही है। भाषा केवल साहित्य का ही प्रश्न नहीं होती, बल्कि मानव जीवन की प्रत्येक प्रक्रिया में भाषा अपना सहयोग करती है।
मानव के सुख-दुख और संवेदनाएं भाषा में ही प्रकट होती हैं। हमें गर्व है कि हमारी भाषा हिंदी मानवीय संवेदनाओं को व्यापक रूप से अभिव्यक्त करने में सफल है। हिंदी की देवनागरी लिपि की विशेषता है कि चाहे बोलने में हो, चाहे लिखने में या फिर पढ़ने में, इसकी स्पष्टता और एकरूपता सर्वत्र समान रहती है। अब तो ज्ञान-विज्ञान का साहित्य भी हिंदी में लिखा जा रहा है, जो वर्तमान समय में हिंदी भाषा के लिए महत्वपूर्ण बात है। परंतु चिंता की बात यह भी है कि हिंदी भाषी प्रदेशों में विद्यालयी स्तर पर हिंदी अभी अपना उपयुक्त स्थान निर्धारित नहीं कर पाई है।
यूपी बोर्ड की परीक्षा में हिंदी विषय में ही लाखों की संख्या में विद्यार्थियों का असफल होना हिंदी की दुर्दशा को भी दर्शाता है। वर्तमान में हिंदी रोजगार से भी जुड़ी है और रोजगार की भाषा भी बनती जा रही है। आने वाला समय निश्चित रूप से हिंदी का है। परंतु इसमें हम सबको एकजुट होकर हिंदी के प्रचार-प्रसार पर और अधिक ध्यान देना होगा।
हिंदी बोलने वालों ने उसे और संपन्न बनाया
निज भाषा उन्नति कहे सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल.. इस बात को आत्मसात करते हुए राष्ट्रभाषा हिंदी को 14 सितंबर 1949 को राजभाषा का दर्जा दिया गया और इसे गौरवमयी बनाया गया हिंदी भाषा को बोलने वालों ने जिनकी संख्या हमारे देश में सबसे अधिक है। हिंदी लोगों के बीच एक संपन्न भाषा का कार्य भी करती है। - सीमा भाटिया, शिक्षक बिशप कोनराड स्कूल