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लापरवाही की धूप.. पेड़ बनने से पहले सूख गए हजारों पौधे

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फूलों वाली कोठी। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
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पर्यावरण संरक्षण के दावों की पोल खोल रहा वृहद पौधरोपण अभियान की हकीकत
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आवारा पशुओं का निवाला बन रहे पौधे, निगरानी के अभाव में मुरझा रही हरियाली

बरेली। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर प्रदेश को हरा भरा बनाने की उम्मीद अफसरों की कारगुजारी के आगे टूट रही है। अफसरों का दावा है कि जिले में साल दर साल मिल रहे लक्ष्य को पूरा किया जा रहा है। दावों की पड़ताल अमर उजाला की टीम ने की तो हवा हवाई साबित हुआ। अनुमान के मुताबिक हजारों पौधे सूख चुके हैं। निगरानी के अभाव में किसी तरह पनप रहे हजारों पौधे जानवरों का निवाला बन रहे हैं।
रक्षा संपदा विभाग के तहत बरेली-बीसलपुर मार्ग स्थित भरतौल फायरिंग रेंज कंथरिया छावनी क्षेत्र की करीब 14 हेक्टेयर भूमि पर पिछले साल पांच जुलाई को वन विभाग ने 15400 पौधे रोपे थे। करीब साल भर बाद हालत यह है कि उसमें से सैंकड़ों पौधे सूख चुके हैं। जो बचे खुचे हैं वह जानवरों का निवाला बन रहा है। फौरी तौर पर पौध को बचान के लिए की गई फेंसिंग भी जगह-जगह से टूट चुकी है। जानवरों का प्रवेश रोकने के लिए खोदे गए गडढे मिट्टी से भर चुके हैं। पौधों की जगह भूमि पर बड़ी-बड़ी कंटीली झाड़ियां पनप चुकी हैं। जो पौधों पर चढ़कर परजीवी की तरह उन्हें खोखला कर रही हैं। वन विभाग के अफसरों की लापरवाही से लाखों की लागत से लगाए गए पौधे अब बेजान हो रहे हैं।

दस फीसदी पौधे खराब होने की रहती है आशंका

पौधों के सूखने को लेकर जब फॉरेस्ट रेंजर वैभव चौधरी से बात की गई तो उन्होंने बताया कि जितने पौधे लगाए जाते हैं, वह सूखें न इसके लिए निगरानी की जा रही है। बावजूद इसके दस फीसदी पौध सूखने की आशंका रहती है। बताया कि पौधे सूखे नहीं इसके लिए फेंसिंग लगाई गई थी। अगर उसे ग्रामीणों ने तोड़ दिया है, तो जिम्मेदार की पड़ताल कर उनके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होगी। फेंसिंग को दोबारा से लगाया जाएगा।
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34 लाख पौधे रोपने का दावा, करीब सात करोड़ खर्च
जिले को पिछले साल शासन ने 34 लाख पौधे रोपने का लक्ष्य दिया था। अफसरों के मुताबिक पौधरोपण के लिए डीपीआरओ, डीआरडीए, नगर निगम, नगर पंचायत और पालिकाओं समेत बेसिक शिक्षा विभाग समेत 24 विभागों को लक्ष्य दिया गया था। कुछ किसान जिन्होंने पौधे लगाने की मांग की थी उन्हें ग्राम प्रधान के जरिए पौध मुहैया कराई गई थी। पिछले साल पौधरोपण के अभियान पर करीब सात करोड़ का बजट खर्च हुआ था।

हैरानी.. लाखों पौधे लगे पर घटती जा रही ग्रीन लैंड

बरेली। हर साल लाखों पौधे लगाने पर भी न हरियाली छा सकी और न प्रदूषण का स्तर कम हुआ। 20 साल पहले ग्रीन लैंड करीब तीन फीसदी थी जो अब कम होते-होते 1.09 फीसदी बची है। उधर, लाखों पौधे लगाने के बावजूद वन क्षेत्र का दायरा नहीं बढ़ा है। रिकॉर्ड में बरेली का वन क्षेत्र 0.01 फीसदी दर्ज है।
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मानकों के मुताबिक जिले में 33 फीसदी वनक्षेत्र और इतना ही ग्रीन लैंड यानी हरित क्षेत्र होना जरूरी है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए ही साल दर साल बरेली के 26 विभागों को बड़े पैमाने पर पौधरोपण का लक्ष्य मिलता है। हालांकि हकीकत का इससे कोई वास्ता नहीं है, आंकड़ों की हरियाली कागजों तक ही सीमित है। उधर, हरित क्षेत्र हर साल घटता जा रहा है। जो तीन फीसदी से 1.09 फीसदी पहुंच गया है। पिछले चार साल में करीब 60 लाख से पौधे रोपे जा चुके हैं। हैरत यह कि ग्रीन लैंड का दायरा नहीं बढ़ा। वन विभाग के एसडीओ बीएन सिंह का कहना है कि पौधों को पेड़ बनने में करीब 15 साल से ज्यादा का वक्त लगता है। पिछले सालों में लगे पौधरोपण का असर करीब दस साल बाद ही दिखाई देगा। उधर, विकास कार्यों के चलते पेड़ों का कटान होने को भी ग्रीनलैंड कम होने की वजह मान रहे हैं।

पेड़ बन रहे पौधे.. जवाब नहीं दे रहे अफसर

पिछले साल पौधरोपण के करीब पांच माह बाद शासन ने डीएम से रोपे गए पौधों में कितने जीवित हैं, इसकी रिपोर्ट मांगी थी। डीएम ने वन विभाग से जवाब मांगा था। वन विभाग ने सहयोगी 26 विभागों को पत्र भेजकर पौधों की वर्तमान स्थिति का रिकॉर्ड मांगा था। जिसका जवाब न मिलने पर डीएम ने कार्रवाई की चेतावनी दी तो कोरोना का बहाना बनाकर विभागों ने पल्ला झाड़ लिया। करीब सात माह गुजर चुके हैं, मगर अब तक जवाब नहीं मिला।

अपनी जमीन नहीं तो गम नहीं.. घर में बना लिया बागीचा

बरेली। पर्यावरण के तीन अहम तत्व जल, वायु और मृदा को सहेजने में पौधों की अहम भूमिका है। जो प्रदूषण के कारक कार्बन डाई ऑक्साइड आदि हानिकाकरक गैसों को सोखकर प्राणवायु यानी ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। इसी प्रेरणा के चलते कई लोग जिनके पास पौधे लगाने को जमीन नहीं थी तो उन्होंने घर को बागीचा बना लिया है।

लॉकडाउन में लगाए थे पौधे अब खिल रहे..

सुरेश शर्मा नगर नवादा रोड की रहने वाली अंशिका ने पिछले साल लॉकडाउन में पौधे लगाए थे। जो अब खिलने के साथ ही घर की खूबसूरती को भी बढ़ा रहे हैं। पिता राकेश मिश्रा ने बताया कि लॉकडाउन होने पर जब कोई काम नहीं था, तो उस दौरान पर्यावरण की जरूरत को देखते हुए अंशिका ने पौधे लगाने की मांग की। जमीन थी नहीं इसलिए टेरिस गार्डन बनाने की योजना बनाई। विभिन्न प्रकार के गमलों में उगने वाले पौधे लगाए। निगरानी की और अब वह खिलने लगे हैं। बताया कि बेटी को प्रकृति से लगाव है और उसने सहेलियों से भी पौधे लगाने की अपील की है।

देसी-विदेशी फूलों से गुलजार है फूलों वाली कोठी

प्रेमनगर के रहने वाले कारोबारी रजत खंडेलवाल को लोग उनके नाम से कम फूलों की कोठी वालों के नाम से ज्यादा पहचानते हैं। पिछले करीब तीस सालों से बरेली क्लब की ओर से आयोजित फ्लॉवर कॉम्पीटीशन में बेस्ट गार्डन का अवॉर्ड जीत रहे हैं। रजत बताते हैं कि उनकी परिवार की बहू ज्योति और सास स्नेह खंडेलवाल को बागवानी का शौक था। उन्होंने घर को ही अब बोटैनिकल गार्डन बना दिया है। जिसमें विदेशी-देसी 60 प्रजाति के पौधे लगाए। इसमें स्पाईडर, पौमयन, स्नौडैम, मिनिएचर आदि किस्में शामिल हैं। उन्होंने लोगों से भी बागवानी की अपील की है।

खिले फूल और हरियाली से मिलता है मन को सुकून

सीरा मंडी की रहने वाली आर्ट ऑफ लिविंग की प्रशिक्षक शमा गुप्ता पौधों और फूलों को देखने से चिंताओं से मुक्ति मिलने का संदेश देती हैं। शमा हर साल पर्यावरण संरक्षण के लिए पार्क और खाली जगहों पर पौधे लगाती हैं और लोगों को भी अपनी संस्था की ओर से जागरूक करती हैं। उन्होंने बताया कि पहले घर के आगे खाली जगह पर पौधे लगाए थे। बाद में छत पर टेरिस गार्डन बनाया ताकि वहां पर बैठकर ध्यान और योग किया जा सके। बताया कि उनके इस प्रयास को लोगों ने सराहा। कई लोगों ने अपने घर में भी टेरिस गार्डन लगाकर खूबसूरत बनाया है।

पर्यावरण संरक्षण की अलग जगाने का ख्वाब अधूरा

बरेली कॉलेज के एमिरेट प्रोफेसर डॉ. डीके सक्सेना पर्यावरण संरक्षण के लिए अपनी ओर से हर संभव प्रयास कर रहे हैं। बीते सालों में जब उन्होंने बरेली के पर्यावरण को खतरनाक स्तर से आगे बढ़ने का दावा किया तो उनके खिलाफ नोटिस जारी कर चेतावनी दी गई थी। हालांकि, वह फिर भी नहीं रुके। करीब दो साल पहले उन्होंने वायु प्रदूषण के बढ़ते दुष्प्रभाव के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए पांच मिनट का वीडियो बनाया था। जिसमें वायु प्रदूषण की वजह, होने वाली बीमारियां, वजहें और रोकथाम की अपील थी। जिसे प्रशासन ने अनदेखा कर दिया।
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