कोई बड़ा नेता मौजूद नहीं है। जिलाध्यक्ष वीरपाल सिंह यादव के कमरे में सन्नाटा पसरा है। महानगर अध्यक्ष और अन्य नेताओं के कमरे में भी कोई नहीं है। कमरे में टीवी भी लगा है लेकिन उसकी डिश नहीं चल रही है। धर्मेंद्र और ब्रजेश कुर्सी पर बैठे मोबाइल पर टीवी चैनल देख रहे हैं। उसमें मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा अपने चाचा शिवपाल सिंह समेत अन्य मंत्रियों को बर्खास्त करने का समाचार चल रहा है। तभी एक अन्य व्यक्ति कमरे में प्रवेश करते हैं। उनके मुंह से निकलता है कि ये क्या हो रहा है। लगता है कि अब सीएम साहब नई पार्टी बना लेंगे। तभी दूसरा स्वर गूंजता है कि नेताजी (मुलायम सिंह यादव) कोई न कोई रास्ता जल्दी निकालें। नहीं तो पार्टी को पहले ही बड़ा नुकसान हो चुका है। ज्यादा चला तो पार्टी नहीं बच पाएगी।
रविवार को अवकाश की वजह से सपा के दफ्तर में वैसे ही बहुत कम लोग आते हैं। फिर भी उनकी संख्या दस, बीस या 50 तक पहुंच जाती है। ये रविवार सपा में ऊपरी स्तर पर चल रही पारिवारिक अंतर्कलह से खास था। चर्चा सिर्फ एक थी कि शिवपाल को बर्खास्त करने के बाद नेताजी का अगला कदम क्या होगा। उसका जवाब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव क्या देंगे। महानगर अध्यक्ष जफरबेग का फोन लगाया तो वह लखनऊ में थे। बोले- जिलाध्यक्ष और उनको अचानक लखनऊ तलब कर लिया गया है। सोमवार को नेताजी (मुलायम सिंह यादव) ने बैठक बुलाई है। इससे पहले वह देर रात में भी मशविरा करेंगे। पूर्व विधायक महिपाल सिंह यादव भी लखनऊ में थे। बोले- बड़े लोगों के झगड़े में हम क्या बोलें। पार्टी का नुकसान तो हो रहा है। हमें कुछ नहीं कहना। दोपहर बाद सपा के जिला महासचिव संजीव यादव, पार्षद अशोक यादव और रवींद्र यादव लखनऊ जाते हुए गांधी उद्यान के पास मिले। सबके माथे पर चिंता झलक रही थी। जिलाध्यक्ष वीरपाल सिंह यादव ने तो शाम पांच बजे के बाद अपना मोबाइल ही स्विच ऑफ कर लिया।