प्रशिक्षण के बाद उन्होंने जैविक खेती के लिए अपना पंजीकरण करा लिया। जैविक खेती करने से पहले गन्ने की फसल से कोई खास आय नहीं होती थी। प्रयोग के बाद अप्रत्याशित परिवर्तन नजर आया। गन्ने की वही फसल साल भर बाद तीन गुने दाम पर बिकी। उत्पादित गुड़ की कीमत बाजार में डेढ़ सौ रुपये किलो मिली। आमतौर पर बाजार में सामान्य गुड़ 40-50 रुपये किलो ही बिकता है। इसके अलावा गन्ने के रस से सिरका बनाकर भी अच्छी आमदनी की। इससे उत्साह दोगुना हो गया।
सहफसली खेती ने बढ़ाया मुनाफा
सर्वेश के मुताबिक गन्ने के साथ मेंथा, सरसों आदि फसलों की भी खेती की। इसे सहफसली खेती कहते हैं। इसका प्रशिक्षण भी कृषि विज्ञान केंद्र से प्राप्त किया। परिणाम रहा कि गन्ने की फसल में लगने वाली लागत सहफसली के तौर पर लगाई गई फसल से ही प्राप्त होने लगी। इसके अलावा मेंथा लगाने की वजह से गन्ने में आमतौर पर होने वाली बीमारियां भी नहीं हुई। पता चला कि मेंथा की फसल में कीटनाशी गुण होते हैं। बताया कि वर्तमान में वह करीब 16 बीघे में जैविक खेती कर रहे हैं। सालाना आय करीब पांच लाख रुपये से ज्यादा है।
व्यापारियों को मुहैया कराने के लिए कम पड़ता है माल
उत्पादित फसलों की गुणवत्ता के आधार पर बिक्री अधिक होने की वजह से अब व्यापारियों की मांग के अनुसार माल की कमी हो जाती है। सर्वेश ने बताया कि पिछले साल उन्होंने ग्रेम फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड नाम से एक फर्म की शुरुआत भी कर दी है। इसके जरिए वह जैविक खेती को बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। उनकी फर्म से अब तक एक, दो बीघे वाले 250 किसान जुड़ चुके हैं। उनका उद्देश्य खेती को केमिकल से मुक्त करना है। इसके अलावा वह कृषि कॉलेजों, केंद्र और प्रदेश सरकार के कार्यक्रमों में व्याख्यान देने भी पहुंचते हैं।