बरेली। कोरोना महामारी के बाद इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों में संसाधन तो बढ़े पर विशेषज्ञ चिकित्सकों के अभाव में वे धूल फांक रहे हैं। तीन सौ बेड अस्पताल का संचालन अधर में है। कई आरोग्य मंदिरों को सीएचओ का इंतजार है। स्वीकृति के सापेक्ष आधे पदों पर ही तैनाती है।
नतीजा, शासन प्रशासन के तमाम दावों के बावजूद गरीब तबके के लोग बेहतर इलाज के लिए भटक रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक जिले में सीएचसी, पीएचसी, यूपीएचसी समेत 71 स्वास्थ्य केंद्र हैं। अस्पतालों में मरीजों की कतार लग रही है। प्रतिदिन पांच हजार मरीजों का इलाज सरकारी अस्पतालों में हो रहा है। तीन सौ बेड अस्पताल में आईसीयू, सीसीयू, एनआईसीयू बनी हुई हैं। वेंटिलेटर, एचएफएनसी, बाईपैप समेत 25 करोड़ से ज्यादा लागत के उपकरणों का संचालन अब तक नहीं हो सका है।
ऑक्सीजन प्लांट भी स्थापित है, पर यह सिर्फ मॉकडि्रल के दौरान ही चलाया जाता है। यही हाल अन्य उपकरणों का भी है। जिला अस्पताल में भी दो वेंटिलेटर हैं, पर विशेषज्ञ के अभाव में मरीजों को हायर सेंटर रेफर किया जा रहा है। यहां स्वीकृत 43 पद के सापेक्ष 30 चिकित्सक तैनात हैं।
50 लाख की आबादी, सरकारी डॉक्टर महज 200
सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो जिले की आबादी अब 50 लाख के पार जा पहुंची है। 16 सीएचसी पर 230 स्वीकृत पदों के सापेक्ष 148 चिकित्सकों की ही तैनाती है। महिला अस्पताल में स्वीकृत 16 के सापेक्ष छह महिला चिकित्सक ही तैनात हैं। रेडियोलॉजिस्ट भी यहां सप्ताह में दो दिन ही आते हैं। तीन सौ बेड अस्पताल में पांच चिकित्सकों की ओपीडी हो रही है। ज्यादातर संविदा चिकित्सकों की सेवाएं ली जा रही हैं। अमर उजाला ब्यूरो
तीन सौ बेड अस्पताल के संचालन के लिए चार सौ से ज्यादा मानव संसाधन की जरूरत है। जिले में चिकित्सकों के रिक्त पदों पर तैनाती के लिए शासन को पत्र भेजा जा रहा है। सीमित संसाधनों में मरीजों को बेहतर इलाज दिया जा रहा है। - डॉ. विश्राम सिंह, सीएमओ