साहित्यकारों ने बताया जनकवि
तीन फरवरी 1991 को प्रकाशित एक अन्य लेख में पंडित जी के प्रति उस समय के ख्यातिलब्ध साहित्यकारों और समालोचकों ने अपनी राय व्यक्त की है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार पद्मश्री आचार्य क्षेमचंद्र सुमन ने पंडित जी के जन्मशती समारोह में कहा था कि पंडित राधेश्याम कथावाचक ने रामकथा के माध्यम से खड़ी बोली में राम काव्य की रचना कर उसे लोकप्रिय बनाया। तुलसी ने मानस के माध्यम से जो भावना उद्भूत की, उसकी अनेक क्लिष्टताओं को पंडित जी ने राधेश्याम रामायण मे माध्यम से दूर किया।
डॉ. कैलाश नाथ तिवारी ने जन्मशती समारोह में कहा था कि वाल्मीकि-तुलसी की तुलना में पंडित राधेश्याम की रामायण सरल व सहज है। वे जन कवि हैं। राधेश्याम रामायण के उर्मिला और सुलोचना के प्रसंग का हवाला देते हुए उन्होंने कहा था कि पंडित जी ने तुलसी कथा प्रसंगों की रिक्तता को पूर्ण किया।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी प्रवक्ता रहे डॉ. नर्मदेश्वर राय ने इसी समारोह में कहा था कि पंडित जी ने उस दौर में बड़ा काम किया था। उन्होंने अश्लीलता से भरे पारसी मंच को बदल दिया। उसी मंच से उन्होंने रामलीला, रासलीला सहित कई धार्मिक नाटकों को प्रस्तुत किया। तब लोगों को यह समझ में आया कि घर की महिलाओं के साथ भी नाट्यशाला तक जाया जा सकता है।
जीवन परिचय
25 नवंबर 1890 को बिहारीपुर मोहल्ले में जन्मे पंडित राधेश्याम ने पिता के नक्शेकदम पर चलकर कथावाचक के रूप में पहचान बनाई। इसके बाद नाटक लेखन से होते हुए सफर राधेश्याम रामायण तक पहुंचा। यही वह रचना रही, जिसने पंडित जी के व्यक्तित्व को कालजयी बना दिया। अमर उजाला के पुराने पन्ने पलटने पर उनके सफर का प्रमाण मिलता है। 24 जनवरी 1988 को प्रकाशित लेख में उनकी जीवनगाथा का संक्षिप्त परिचय दिया गया है। 26 अगस्त 1963 को पंडित जी ने आखिरी सांस ली थी। अपने जीवन काल में पंडित जी ने 150 से अधिक नाटकों-किताबों का लेखन-संपादन किया।