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Ramleela: राधेश्याम के राम से जीवंत रामलीला का मंच, सरल-सहज और खड़ी बोली में रची रामायण

Wed, 02 Oct 2024 03:15 PM IST
मुकेश कुमार शैलेश उपाध्याय, अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

सार

बरेली के बिहारीपुर मोहल्ले में 25 नवंबर 1890 को जन्मे पंडित राधेश्याम ने अपने पिता के नक्शेकदम पर चलकर कथावाचक के रूप में पहचान बनाई। उन्होंने खड़ी बोली में राधेश्याम रामायण की रचना कर इसे मंच तक पहुंचाया। 
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राधेश्याम रामायण - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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राम सनातन संस्कृति के प्राण हैं। त्रेता युग में उन्होंने मर्यादा के जो प्रतिमान स्थापित किए, महर्षि वाल्मीकि ने उसे लिपिबद्ध किया। कालांतर में तुलसीदास ने इसे और सरल-सहज रूप में प्रस्तुत किया। रुहेलखंड की बात करें तो यहां अवधी भाषा ज्यादा प्रचलित नहीं। इस क्लिष्टता को दूर किया राधेश्याम कथावाचक ने। खड़ी बोली में राधेश्याम रामायण की रचना कर कथावाचक ने इसे मंच तक पहुंचाया। उनके जीवन काल में ही राधेश्याम रामायण की डेढ़ करोड़ से अधिक प्रतियां बिक गई थीं।

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आज देश-दुनिया की ज्यादातर रामलीलाओं का मंचन इसी के आधार पर ही होता है। हर मंच पर राम के साथ ही पंडित राधेश्याम का किरदार जीवंत होता है। उनके लिखे राधेश्यामी छंद लोगों को खूब पसंद आए। मंच के जरिये ये संवाद सीधे दर्शकों के दिल में उतर गए। 

तब चलचित्र प्रचलित नहीं थे, लेकिन मंच पर कलाकारों के बीच का संवाद दर्शकों के मानस पटल पर पूरे दृश्य का रेखांकन कर देता था। रुहेलखंड के कण-कण में राधेश्याम के राम ही बसते हैं, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। अलवर नरेश ने महारानी के साथ उनकी कथा सुनने के बाद पंडित जी को एक स्मृति पट्टिका प्रदान की थी। उस पर लिखा था -

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समय समय पर भेजते संतों को श्रीराम।
वाल्मीकि तुलसी हुए, तुलसी राधेश्याम।।

साहित्यकारों ने बताया जनकवि 
तीन फरवरी 1991 को प्रकाशित एक अन्य लेख में पंडित जी के प्रति उस समय के ख्यातिलब्ध साहित्यकारों और समालोचकों ने अपनी राय व्यक्त की है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार पद्मश्री आचार्य क्षेमचंद्र सुमन ने पंडित जी के जन्मशती समारोह में कहा था कि पंडित राधेश्याम कथावाचक ने रामकथा के माध्यम से खड़ी बोली में राम काव्य की रचना कर उसे लोकप्रिय बनाया। तुलसी ने मानस के माध्यम से जो भावना उद्भूत की, उसकी अनेक क्लिष्टताओं को पंडित जी ने राधेश्याम रामायण मे माध्यम से दूर किया। 

डॉ. कैलाश नाथ तिवारी ने जन्मशती समारोह में कहा था कि वाल्मीकि-तुलसी की तुलना में पंडित राधेश्याम की रामायण सरल व सहज है। वे जन कवि हैं। राधेश्याम रामायण के उर्मिला और सुलोचना के प्रसंग का हवाला देते हुए उन्होंने कहा था कि पंडित जी ने तुलसी कथा प्रसंगों की रिक्तता को पूर्ण किया।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी प्रवक्ता रहे डॉ. नर्मदेश्वर राय ने इसी समारोह में कहा था कि पंडित जी ने उस दौर में बड़ा काम किया था। उन्होंने अश्लीलता से भरे पारसी मंच को बदल दिया। उसी मंच से उन्होंने रामलीला, रासलीला सहित कई धार्मिक नाटकों को प्रस्तुत किया। तब लोगों को यह समझ में आया कि घर की महिलाओं के साथ भी नाट्यशाला तक जाया जा सकता है।
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जीवन परिचय
25 नवंबर 1890 को बिहारीपुर मोहल्ले में जन्मे पंडित राधेश्याम ने पिता के नक्शेकदम पर चलकर कथावाचक के रूप में पहचान बनाई। इसके बाद नाटक लेखन से होते हुए सफर राधेश्याम रामायण तक पहुंचा। यही वह रचना रही, जिसने पंडित जी के व्यक्तित्व को कालजयी बना दिया। अमर उजाला के पुराने पन्ने पलटने पर उनके सफर का प्रमाण मिलता है। 24 जनवरी 1988 को प्रकाशित लेख में उनकी जीवनगाथा का संक्षिप्त परिचय दिया गया है। 26 अगस्त 1963 को पंडित जी ने आखिरी सांस ली थी। अपने जीवन काल में पंडित जी ने 150 से अधिक नाटकों-किताबों का लेखन-संपादन किया।
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