विद्यार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे निजी स्कूल
फीस का यह बोझ केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक भी है। समय पर फीस जमा न होने पर बच्चों को प्रताड़ित करना अब आम बात हो गई है। इससे बच्चों के मन में अपने ही अभिभावकों के प्रति हीन भावना पैदा होने लगती है। सबसे खौफनाक पहलू तो यह है कि स्कूल अब बच्चों के दस्तावेज और बोर्ड परीक्षा के एडमिट कार्ड तक रोकने लगे हैं। हाल ही में शहर के एक स्कूल ने 12वीं के तीन छात्रों का भविष्य सिर्फ इसलिए दांव पर लगा दिया, क्योंकि उनकी फीस बकाया थी। शिक्षा विभाग कार्रवाई का दावा तो करता है, लेकिन रसूखदार स्कूल संचालकों पर इसका कोई असर नहीं दिखता।
हर साल फीस बढ़ाना अनिवार्य नहीं
अभिभावक संघ के अध्यक्ष अंकुर किशोर सक्सेना ने बताया कि स्कूलों की फीस हर वर्ष बढ़ाना कोई अनिवार्य नियम नहीं है। फीस वृद्धि से पहले यह जांच होना आवश्यक है कि वास्तव में बढ़ोतरी की जरूरत है या नहीं। इसी उद्देश्य से जिला शुल्क समिति का गठन किया गया है, लेकिन दुर्भाग्यवश उसके सचिव (डीआईओएस) की ओर से नियमित बैठकें नहीं बुलाई जातीं। इस विषय पर जिलाधिकारी का भी अपेक्षित ध्यान अभी तक नहीं गया है। यदि फीस बढ़ाना आवश्यक नहीं है तो स्कूलों को अनावश्यक रूप से इसकी अनुमति नहीं देनी चाहिए।
जेडी राकेश कुमार ने बताया कि ऐसे मामलों के लिए जिलाधिकारी की ओर से समिति बनाई गई है। आने वाली शिकायतों की जांच कर नियमानुसार कार्रवाई की जाती है। अब तक हमारे पास किसी अभिभावक की शिकायत नहीं आई है।