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लखनऊ से लौटकर राजेश ने कहा- मेरी पारी अब पूरी

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बरेली। शाम करीब सात बजे का वक्त रहा होगा, चार दिन पहले तक सूबे के वित्त मंत्री का पद संभालने वाले राजेश अग्रवाल कालीबाड़ी में अपने आवासीय परिसर में ही स्थित दफ्तर में शांत चित्त होकर बैठे नजर आए। कुछ दिन पहले की तरह न व्यस्तता थी न इर्द-गिर्द अफसरों और नेताओं का फौजफाटा। पार्टी के नेताओं के नाम पर महानगर अध्यक्ष केएम अरोरा, प्रभुदयाल लोधी, अजय प्रताप सिंह आदि गिनेचुने लोग मौजूद थे। यह संवाददाता पहुंचा तो काफी समय बाद उनके साथ इत्मीनान के साथ मुलाकात हो पाई। औपचारिक बातों के बाद बोले- मुझे तो अब मालूम हुआ कि मैं 75 नहीं बल्कि 76 का होने जा रहा हूं। इस लिहाज से एक साल पहले ही मंत्री पद छोड़ देना चाहिए था, लेकिन थोड़ी बेईमानी हो गई। फिर संभलकर बोले- मेरी पारी पूरी हो चुकी है। हालांकि सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने के सवाल को टाल दिया। कहा, यह अभी भी भविष्य का सवाल है।
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इस्तीफा देने के बाद बरेली लौटे राजेश अग्रवाल शुक्रवार करीब पौने तीन बजे अपने आवास पर पहुंचे। उनके आने की खबर मिलने के बाद चंद लोग ही उनसे मिलने पहुंचे। कुछ देर लोगों से मिलने के बाद आराम करने चले गए। शाम करीब छह बजे दोबारा अपने दफ्तर में बैठे। इसके बाद कुछ नेता फिर मिलने पहुंचे। बातचीत में जिसने भी इस्तीफा देने पर सवाल किया तो इसे उन्होंने पार्टी का नियम बताया। अमर उजाला से बातचीत में कहा कि शहरवासी उम्मीद न छोड़ें कि शहर में चल रहे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट अव लटक जाएंगे। अगली बार विधानसभा चुनाव लड़ने के सवाल पर कहा कि मेरी पारी पूरी हो चुकी है लेकिन सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने के सवाल को टाल गए। इस दौरान विष्णु शर्मा, राज अग्रवाल आदि भी मौजूद रहे।
कुछ लोगों का स्नेह मिलता तो जिला
जेल का प्लान साकार हो जाता
राजेश अग्रवाल ने कहा कि उन्हें सिर्फ इस बात का दुख है कि जिला जेल का उनका प्लान कुछ लोगों का स्नेह न मिलने की वजह से अटक गया। इससे बरेली का बहुत बड़ा विकास बाधित हुआ है। केंद्र सरकार के सहयोग से बनने वाले आईटी प्रोजेक्ट के लिए 28 करोड़ का बजट भी स्वीकृत हो गया था लेकिन कुछ लोग उसका महत्व समझ नहीं पाए। बोले, किला पुल के फोरलेन के लिए भी इसी वित्तीय वर्ष में बजट दिलाने का प्रयास करेंगे।
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अफसरों को अब सबकी सुननी पड़ेगी
जिले में नौ विधायक होने के बावजूद कैबिनेट में किसी नए चेहरे को जगह नहीं मिली। हालांकि कुछ लोगों को छोड़कर पार्टी नेताओं पर इसका कोई खास असर नहीं दिख रहा है। कुछ लोग तो दिखावटी मायूसी जता रहे हैं लेकिन अंदर ही अंदर उनके मन में कुछ और है। दबी जुबान कुछ लोगों ने यह कहने में भी नहीं चूके कि अधिकारी अब कम से कम दूसरे लोगों की भी सुनेंगे। अब तक तो किसी की बात सुनी ही नहीं जाती थी।
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