प्रियांशु की मौत किसी हत्या से कम नहीं और इसके लिए स्कूल प्रबंधन ही नहीं परिवहन विभाग भी बराबर का जिम्मेदार है। जिस तरह टैंपो में स्कूली बच्चे ढोए जा रहे थे ऐसा हादसा कभी भी हो सकता था। अवैध रूप से स्कूल वाहन के रूप में चलने वाला यह इकलौता टैंपो नहीं है जिसमें इस तरह छात्रों को ठूंसकर भरा जा रहा है लेकिन परिवहन विभाग को ऐसे टैंपो नहीं दिखाई देते। अगर बच्चों की संख्या कम होती तो शायद प्रिंयाशु की जान नहीं जाती। हाईवे के गड्ढे कई बार हादसे का सबब बने हैं। लिखकर भी यहां के लोगों ने दिया लेकिन मरम्मत नहीं हुई। स्कूल वाले ने खस्ताहाल टैंपो को स्कूली वाहन बनाया उसमें ज्यादा बच्चे ठूंसने के लिए बेंचे डाली गई थी।
स्कूली वाहनों के मानकों के किसी भी नियम का पालन न तो स्कूल वाले करना चाहते हैं और न परिवहन विभाग कराना चाहता है। हर हादसे के बाद दो दिन का अभियान और फिर मामला ठंडे बस्ते में। इसके लिए अभिभावक भी जिम्मेदार कम नहीं। खटारा बसें या रिक्शा देखकर भी उसको ठीक कराने की जिद स्कूल वालों से नहीं की जाती है। जीएलवी स्कूल का टैंपो बहुत खटारा था। बच्चे शिकायत भी करते थे कि रास्ते में बंद हो जाता है। चालक धक्का लगवाता है लेकिन पैरेंट्स ने भी इसका संज्ञान नहीं लिया और स्कूल वालों का काम तो चल ही रहा था।
ऐसे भी हैं स्कूल वाहन
हाफिजगंज के शराफत हुसैन का कहना है कि उनके बच्चे जीनियस स्कूल राजघाट में पढ़ते हैं। टाटा मैजिक में स्कूल जाते आते हैं। उस मैजिक में 30 बच्चे भूसे की तरह ठुंसे रहते हैं। वहीं सिराज अहमद का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा के प्रति लापरवाह स्कूल संचालकों पर सख्त कार्रवाही होनी चाहिए। हरवीर सिंह यादव का कहना है कि वह स्कूल को मुंह मांगी फीस और वाहन किराया देते हैं। इसके बावजूद बच्चों की सुरक्षा में लापरवाही की जाती है। गोशलपुर के जगदीश प्रसाद मिश्रा ने ऐसे विद्यालयों पर कार्रवाई की मांग प्रशासन से की है।
राजेंद्र नगर के अशोक सिंह ने कहा कि उनके बच्चे भी बिना फाटक वाले वाहन से स्कूल जा रहे हैं। अब या तो वैन से भेजेंगे या फिर गेट लगवाने को कहेंगे। इसी तरह घटना की गंभीरता से सहमीं कर्मचारी नगर की अंजना ने कहा कि हमारे बच्चे भी उस समय स्कूल में थे।
इसे स्कूल वाहन कैसे बना दिया
बरेली। जिस टैंपो यूपी25 बीटी 2289 से गिरकर बच्चे की मौत हुई है। वह टैंपो आरटीओ में जाकिर हुसैन के नाम से पंजीकृत हैं। यह हाफिजगंज में रहता है। इसके वाहन की फिटनेस 23 अप्रैल 2016 तक और परमिट 14 मार्र्च 2018 तक मान्य है। नवाबगंज केंद्र से 40 किलोमीटर परिधि में इसे विक्रम चलाने का लाइसेंस प्राप्त है। उसके कई अन्य टेंपो भी चलते है। टैंपो चालक के पास परमिट तो था, लेकिन वह स्कूल की अनुमति से नहीं लिया गया था। टेंपो में निर्धारित मानक से दोगुने 14 बच्चे बैठाए गए थे। जबकि टेंपो में केवल आठ बच्चे ही बैठाने का निर्देश है। गोशलपुर के सत्येंद्र कुमार का कहना है कि साल भर पहले यही टेंपो गांव के बाहर पलटा था। उस वक्त टेंपो खाली था। उन्होंने इसकी शिकायत स्कूल प्रबंधन से की थी। मगर स्कूल वालों ने कोई ध्यान नहीं दिया।
अभियान केवल शहर के लिए
आरटीओ और ट्रैफिक पुलिस की ग्रामीण क्षेत्रों के वाहनों पर इनकी नजर कम ही जाती है। अभी तक जितने भी हादसे वाहनाें को लेकर हुए हैं वह सभी ग्रामीण इलाके में हुए हैं। पिछले दिनाें ट्रांसपोर्टराें ने आरटीओ को कई ऐसे सबूत दिए थे, जिसमें ओवरलोड वाहनाें को पासिंग दी गई थी। ट्रांसपोर्टराें का कहना है कि ओवरलोड वाहन को शहर में आने की इजाजत आरटीओ की मिलीभगत से मिल रही है। देहात के वाहन रोजाना ही ओवरलोड होकर चलते हैं।
केवल होता है चालान
आरटीओ विभाग के अधिकारियाें की माने तो ओवरलोड वाहनाें के लिए उनकी सख्ती भी केवल चालान करने तक ही सीमित है। अगर वाहनाें में निर्धारित संख्या से अधिक सवारियां बैठी हाेंगी तो 1200 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से चालान काटा जाता है। इसके बाद वह फिर ओवरलोडिंग कर चलता है। पिछले दिनाें आरटीओ व परिवहन विभाग की चेकिंग अभियान में नाममात्र के ही स्कूल वाहन पकड़ में आए थे।
- यह हैं सीट के मानक
ऑटो- 6 बच्चे चालक
वैन- 10 बच्चे चालक
टैंपो - 8 बच्चे व चालक
टैंपो चालक के और भी चलते हैं टैंपो
वर्जन--
‘स्कूल वाहनाें की ओवरलोडिंग पर भी कार्रवाई की जाती है। लेकिन यह चालान तक सीमित है। ग्रामीण इलाकाें में भी पिछले माह वाहन पकड़े थे। ओवरलोडिंग के लिए कड़ा कानून न होने से दिक्कत हो रही है। आज का जो हादसा हुआ है, उस पर चालक और मालिक पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।’
उमाशंकर यादव, एआरटीओ प्रवर्तन
कोट
टैंपो में केवल आठ ही बच्चे थे। टैंपो का चालक पुराना है और उसके पास ड्राइविंग लाइसेंस भी है। टैंपो अभी रिपेयर होकर आया है। गेट बनने के लिए आर्डर दिया गया है।
- मयंक कुमार, जीएलवी स्कूल कोआर्डिनेटर