बरेली। स्थायी लोक अदालत की बेंच ने भारतीय जीवन बीमा निगम को बीमित पीड़िता को 43,524 रुपये अदा करने के आदेश दिए हैं। बेंच ने कहा कि बीमा कंपनी के चिकित्सकों के पैनल ने पहले ही पीड़िता और उसके पति की सभी जांचें कर ली थीं। उसके बाद बीमा किया था। इसके बावजूद पाइल्स की बीमारी छुपाने का आरोप लगाकर उसे भुगतान नहीं किया है।
गांधीपुरम् फेज दो निवासी चेतना श्रीवास्तव ने न्यायालय में बताया कि एलआईसी के अभिकर्ता गोपाल कश्यप के अनुरोध पर मेडिकल पॉलिसी ली थी। 15 फरवरी 2019 को वार्षिक बीमा प्रीमियम राशि 27,403 रुपये अदा किया। उसमें पति सुरेश चंद्र श्रीवास्तव का भी बीमा था। योजना का जोखिम समाप्त होने की तिथि 15 फरवरी 2040 है। पॉलिसी लेनेे से पहले कंपनी ने मेडिकल करवाया था। 15 अक्तूबर 2023 को उसकी तबीयत खराब हो गई। जांच में डेंगू पाया गया। जिसमें 23,524 रुपये का खर्च हुआ। व्यय की प्रतिपूर्ति के लिए जब बीमा कंपनी से संपर्क किया गया तो 22 जनवरी 2024 को उसको पूर्व प्रवर्तित रोग का उल्लेख करते हुए निरस्त कर दिया गया। उन्हें पूर्व में दी गई जानकारी के संबंध में अवगत कराया गया। लेकिन अनुरोध पत्र निरस्त कर दिया गया। अदालत की बेंच में अध्यक्ष मानवेंद्र सिंह, सदस्य संजीव कुमार गौतम और सदस्य अनीता यादव ने कहा कि बीमा कंपनी के अधिकारियों और कर्मचारियों की ओर से मामलों को सुलह-समझौते के आधार पर निस्तारित नहीं किया गया। प्रत्येक स्तर पर आपत्तिजनक आचरण ही किया गया। अब लोक अदालत ने बीमा कंपनी को एक माह के भीतर व्यय की गई धनराशि के साथ ही 10 हजार रुपये मानसिक क्षतिपूर्ति और 10 हजार रुपये वाद व्यय के रूप में अदा करने का आदेश दिया। संवाद