बरेली। स्पेशल जज (एंटी करप्शन) कमलेश्वर पांडेय ने आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोपी दरोगा अनोखे लाल गंगवार की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी है। उसकी तैनाती वर्तमान में बिजनौर जिले के थाना अफजलगढ़ में है। उसके खिलाफ वर्ष 2024 में संभल के थाना जुनावई में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी।
मूल रूप से बरेली के हाफिजगंज थाना क्षेत्र के गांव नगरिया रघुनाथपुर निवासी दरोगा अनोखे लाल शहर के बारादरी थाना क्षेत्र के मोहल्ला दुर्गानगर में रहता है। उसके खिलाफ अपर पुलिस महानिदेशक के आदेश पर जांच कराई गई थी। एंटी करप्शन टीम ने एक मार्च 2013 से अगस्त 2020 तक विभिन्न स्रोतों से उसकी आय और किए गए खर्च की जांच की। पता लगा कि इस दौरान दरोगा अनोखे लाल को विभिन्न स्रोतों से 33..81 लाख रुपये की आय हुई। जबकि, इसी दौरान उसने कार खरीदने, मकान बनवाने समेत अन्य सुख-सुविधाओं पर 66.72 लाख रुपये खर्च किए। यह उसकी आय से करीब 94 फीसदी अधिक है।
दरोगा ने गिरफ्तारी से बचने के लिए वकील के जरिये स्पेशल जज (एंटी करप्शन) के कोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल की थी। दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने उसकी अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी है। संवाद
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तीन गवाह हुए पक्षद्रोही, अपहरण के चार आरोपी दोषमुक्त
बंटवारे को लेकर चल रहा था विवाद, भाई-भतीजों पर था आरोप
संवाद न्यूज एजेंसी
बरेली। अपर सत्र न्यायाधीश (कक्ष संख्या नौ) अविनाश कुमार सिंह ने अपहरण के चार आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया है। इस मामले में भाई-भतीजों पर ही आरोप था। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ठोस साक्ष्य, तर्क और गवाह पेश नहीं कर सका। तीन गवाह पक्षद्रोही हो गए।
बहेड़ी के गांव पृथ्वीपुर निवासी तुलाराम ने 21 अक्तूबर 2005 को अपने भाई जमुना प्रसाद, भतीजे हरीश, महेश और गांव के ही नोनीराम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी। आरोप था कि उसका भाई लीलाधर 21 सितंबर 2005 को घर से अपनी बेटी ममता की ससुराल जाने और वहां से दो-चार दिन बाद लौटने की बात कहकर निकला था। वह घर नहीं लौटा तो तलाश की गई, लेकिन कुछ पता नहीं चला।
बाद में गांव रजपुरा के परमानंद और जगदीश ने बताया कि उन्होंने लीलाधर को अबरार मिस्त्री की दुकान पर देखा था। उसके साथ जगदीश और महेश घूम रहे थे। इसी आधार पर तुलाराम ने रिपोर्ट दर्ज करा दी। यह भी आरोप लगाया कि जमुना प्रसाद और उसके बेटों ने लीलाधर की पत्नी मूलो देवी की हत्या कर दी थी, लेकिन साक्ष्यों के अभाव में बरी हो गए थे। अब वे लीलाधर की भी हत्या करना चाहते थे।
जांच के बाद पुलिस ने 26 मई 2006 को आरोपपत्र दाखिल किया। सुनवाई के दौरान अभियोजन की ओर से आठ गवाह और सात साक्ष्य पेश किए गए। प्रत्यक्षदर्शी परमानंद और जगदीश ने भी ऐसे किसी मामले से इन्कार कर दिया। पता चला कि दोनों पक्षों में बंटवारे को लेकर विवाद था। अभियोजन पक्ष अपहरण की वजह तक नहीं बता सका। कोर्ट ने चारों आरोपियों को दोषमुक्त करार दे दिया।