एसआरएमएस के आईसीयू वार्ड में जीबीएस जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे बारह साल के निशांत गंगवार के परिजन अपने घर में ही हैं। घरवाले भले ही अस्पताल न पहुंचे हो, लेकिन मामले को अमर उजाला के प्रमुखता से प्रकाशित करने पर डीएम सुरेंद्र सिंह ने इसे संज्ञान में लिया और एसआरएमएस प्रशासन को बुलाया। अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक ब्रिगेडियर एसके हांडा ने डीएम को पूरे मामले से अवगत कराया।
इधर, इज्जतनगर क्षेत्र के मिनी बाईपास स्थित अवध धाम कॉलोनी में निशांत के घर बुधवार शाम पांच बजे अमर उजाला की टीम पहुंची। दरवाजे पर एक युवक मिला, जिसने अपने को निशांत का मौसेरा भाई बताया। कहने पर वह घर के अंदर गया तो निशांत की मां कुसुम लता निकल कर आईं। कुसुम लता ने बताया कि निशांत उनका इकलौता बेटा है और उसका इलाज कराने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। यह बात हो रही थी कि तभी निशांत के पिता कांता प्रसाद गंगवार भी घर के दरवाजे पर आ गए और पीछे से उनकी दो छोटी बेटियां भी। कांता प्रसाद ने लंबे समय से भर्ती होने से निशांत की कमर में हुए बेडसोर के फोटो दिखाए। उन्होंने बताया कि निशांत के इलाज में लाखों रुपये लग गए, जिसके बिल उनके पास हैं। कोई फायदा न होने पर डॉक्टरों की सलाह पर वह निशांत को सर गंगा राम दिल्ली ले गए, जहां दस दिन तक भर्ती रखने के बाद डॉक्टरों के कहने पर वह उसे फिर एसआरएमएस ले आए। यहां आईसीयू में भर्ती करने के बाद निशांत से उन्हें मिलने तक नहीं दिया गया। ं दो डॉक्टरों ने उनसे बदतमीजी भी की, जिसकी शिकायत उन्होंने जब निशांत का इलाज कर रही महिला डॉक्टर से की तो बदतमीजी करने वाले डॉक्टरों ने उससे झगड़ा किया । कांता प्रसाद के मुताबिक वह तभी से अस्पताल नहीं गए। उन्होंने शिकायत डीएम, एसएसपी से भी की। वहीं मां कुसुम लता का कहना है कि उनका बच्चा ठीक हो जाए। वह उससे मिलना चाहती हैं, लेकिन उन पर कोई तोहमत न मढ़ जाए, इसी वजह से अस्पताल जाने से डर रही हैं। ताज्जुब की बात ये है कि तब से वह चुप बैठे हैं। अगर ये बातें सच हैं तो पुलिस रिपोर्ट कर सकते थे या कोर्ट जा सकते थे लेकिन चार महीने में उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। डाक्टरों के कथित व्यवहार पर उन्होंने प्रबंधन से भी कोई शिकायत नहीं की।
अस्पताल का पक्ष
अस्पताल के प्रवक्ता का कहना है कि निशांत के पिता गलत आरोप लगा रहे हैं। यह बात जरूर है कि वह बच्चे के साथ आईसीयू में रहने को कह रहे थे तो उन्हें मना कर दिया गया था क्योंकि इससे दूसरे मरीजों को भी इन्फेक्शन का खतरा रहता है। वे बाहर रह सकते थे। मुलाकात के तय समय में मिलने पर कोई आपत्ति नहीं थी। उन्हें अगर इलाज संतोष जनक नहीं लग रहा था तो अपने मरीज को डिस्चार्ज करा सकते थे। उन्होंने तो उसे लाइलाज जानकर अस्पताल आना ही बंद कर दिया। बहरहाल अस्पताल का स्टाफ उसकी चार महीने से मां-बाप के बिना भी पूरी देखभाल कर रहा है। यहां पैसा कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। बच्चे को इमोशनल सपोर्ट के लिए मां-बाप की जरूरत है। जब वे नहीं आए तो कोर्ट में अर्जी देनी पड़ी।
स्वयं सेवी संस्थाएं भी आगे आई
अमर उजाला में बच्चे के इलाज में आ रही परेशानी की खबर प्रकाशित होने के बाद शहर की सामाजिक संस्थाएं मदद के लिए आगे आ रहीं हैं। समाज सेविका शालिनी अग्रवाल अरोरा ने कहा है कि उनकी संस्था मदद करेगी। उनकी केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार तथा अन्य जनप्रतिनिधियों से इस बारे में वार्ता भी हुई है।
डीएम बोले
‘मरीज के इलाज में धन की कमी आड़े नहीं आने दी जाएगी। एसडीएम सदर के माध्यम से शासन से धनराशि के लिए प्रस्ताव भेजने के निर्देश दिए हैं। दूसरी ओर सीएमओ से कहा है कि वह इलाज में खर्च होने वाली धनराशि का इस्टीमेट मेडिकल कालेज से लेलें। जिसके कि आपरेशन कराया जा सके। अदालत के आदेश का भी पालन होगा।’ सुरेंद्र सिंह, डीएम