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कानून के जानकार बोले- मुसलमानों के डर को कैश कर रहे हैं सियासी दल

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बरेली। नागरिकता कानून के खिलाफ देश भर में उन्मादी प्रदर्शन को कानून के जानकार गैरजरूरी करार देते हैं। वे साफ कहते हैं कि मुसलमानों को यह कहकर गुमराह किया जा रहा है कि कानून लागू होने के बाद उन्हें देश से बाहर कर दिया जाएगा। सच्चाई इससे पूरी तरह अलग है। यह कानून सिर्फ घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए है। इससे देश में रह रहे मुसलमानों को कोई खतरा नहीं है।
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संविधान का उल्लंघन नहीं करता नागरिकता कानून
मुसलमानों को बताया जा रहा है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14 यानी समानता का अधिकार का उल्लंघन करता है जबकि इस कानून में किसी भी मजहब के किसी भी भारतीय की नागरिकता छीनने का कोई प्रावधान नहीं है। यह भी भ्रम फैलाया जा रहा है कि मुसलमानों को नागरिकता प्रमाण पत्र दिखाना होगा जबकि यह कानून तीन पड़ोसी देशों के उन अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देने का रास्ता खोलता है, जिन्होंने लंबे समय से भारत में शरण ली हुई है। इन्हें भी नागरिकता तब मिलेगी जब वे 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले भारत में आए हों। नागरिकता कानून में संशोधन से पहले भारतीय नागरिकता के लिए पात्र होने को भारत में 11 साल तक रहना अनिवार्य था, इस सीमा को घटाकर अब छह साल कर दिया गया है। -जितेंद्र सिंह राणा, अधिवक्ता

गलत जानकारी और दुष्प्रचार से भड़क रही हिंसा
नागरिकता कानून सभी को समान अधिकार प्रदान करता है फिर भी भ्रम फैलाया जा रहा है कि यह कानून मुस्लिम विरोधी है। भारतीय मुसलमानों को यह डर दिखाकर भरमाया जा रहा है कि इस कानून से उनकी नागरिकता भी खतरे में पड़ सकती है। हकीकत में यह कानून शरणार्थियों को नागरिकता देने के लिए है। इसमें किसी की नागरिकता छीनने का कोई प्रावधान ही नहीं है। किसी भी भारतीय मुस्लिम या नागरिक को इससे घबराने की कोई जरूरत नहीं है। - राजेश गुप्ता, अधिवक्ता
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भारतीय मुसलमानों के डरने का कोई कारण नहीं
विपक्षी दलों का कहना है कि विधेयक मुसलमानों के साथ भेदभाव करता है क्योंकि उन्हें इसमें शामिल नहीं किया गया है। इस हिसाब से यह संविधान के आर्टिकल 14 का उल्लंघन है जबकि कानून को पूरी तरह समझने पर पता चलता है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान इस्लामिक राष्ट्र हैं, वहां मुस्लिम बहुसंख्यक हैं। इस वजह से उन्हें धर्म के आधार पर उत्पीड़ित मानकर भारत में शरण नहीं दी जा सकती। भारतीय मुसलमान पूरी तरह सुरक्षित हैं। - शिरीष मेहरोत्रा, अधिवक्ता

रायशुमारी करती सरकार तो न होता विरोध
असम में एनआरसी लागू कर वहां रहने वाले पांच लाख मुसलमानों को अवैध निवासी बता दिया गया। नागरिकता कानून को सिर्फ धर्म के आधार पर लागू करने का विरोध है। यह कानून भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है। सरकार की जिम्मेदारी थी कि कानून लाने से पहले जनता से इस पर रायशुमारी कराती लेकिन ऐसा न करके अचानक कानून में संशोधन कर दिया गया। इसी वजह से लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। कौन, कब देश में आकर बसा, इसका क्या प्रमाण होगा, यह भी अस्पष्ट है। - काजी जुबैर अहमद, अधिवक्ता
नहीं चाहिए खाता-बही, जो बड़े नेता कहे वही सही

नागरिकता कानून के प्रावधानों पर प्रमुख दलों के नेता खुद ही भ्रमित
बरेली। प्रमुख दलों के नेताओं के लिए नागरिकता कानून सियासी मुद्दा है। किसी का दावा है कि मुसलमानों का अधिकार छीना जा रहा है तो कोई इसे संविधान का उल्लंघन बता रहा है मगर कुछ नेताओं को यह भी साफ-साफ कहने से कोई गुरेज नहीं कि उन्हें न नागरिकता कानून के बारे में कुछ पता है न उन्हें इसे समझने की जरूरत है। केंद्रीय नेतृत्व ने कहा है तो वह इसका विरोध कर रहे हैं और तब तक करते रहेंगे जब तक विरोध बंद करने का आदेश नहीं आता।

जो बड़े नेता कहीं वही सही, हमें क्या करना कानून जानकर
कांग्रेस के जिलाध्यक्ष रामदेव पांडेय का कहना था कि इस नए कानून से भारत का आम आदमी आहत है। इसलिए सरकार को यह कानून वापस ले लेना चाहिए। जहां तक हमारी बात है तो हमें इसके बारे में कुछ खास नहीं कहना है। हमारे बड़े नेता राहुल गांधी, प्रियंका और सोनिया गांधी, गुलाम नबी आजाद जो कह रहे हैं, वह ठीक ही होगा। हम अपने बड़े नेताओं के पीछे खड़े हैं। वैसे बड़े-बड़े कानूनविद भी इस कानून को गलत बता रहे हैं।

भारत में रहने वाले मुसलमानों पर आंच नहीं आने देंगे
बसपा जिलाध्यक्ष डॉ. जयपाल सिंह ने कहा कि भारत के संविधान में धर्म और जाति के आधार पर नागरिकता देने का प्रावधान नहीं है तो भाजपा क्यों इसे बदलने पर तुली है। नए कानून के जरिये भारत में रह रहे मुसलमानों को निकाल दिया जाएगा। गरीब कहां अपना राशन कार्ड दिखा पाएगा। 1987 के पहले भारत आए और बसे लोगों को ही नागरिकता दी जाएगी। आसाम से वहां के मुसलमानों को हटाए जाने का षड़यंत्र है यह नया कानून।

नए कानून में मुसलमानों को भी शामिल करना चाहिए
समाजवादी पार्टी जिलाध्यक्ष अगम मौर्य का कहना है कि नए कानून में यदि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों को शामिल किया गया है तो मुसलमानों को भी शामिल करना चाहिए। इसीलिए यह संविधान के खिलाफ है। यह पूछे जाने पर कि क्या समाजवादी पार्टी इन देशों के मुसलमानों की पक्षकार है, उन्होंने कहा कि हमें इन देशों से लेने देना नहीं। जिस कानून को बनाया गया है उसमें मुसलमान शब्द भी लाया जाना चाहिए था।

नए कानून का भारतीय मुसलमानों से कुछ लेना-देना नहीं
भाजपा जिलाध्यक्ष पवन शर्मा ने कहा कि इस पूरे मुद्दे पर अफवाह फैलाई जा रही है। नए कानून का भारतीय मुसलमानों से कुछ लेना देना नहीं है। यह तो बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों को भारत में संरक्षित करने और नागरिकता देने की बात करता है। अब इसमें भारतीय मुसलमानों की बात बीच में कहा से आ जाती है। पर भारतीय मुसलमानों के बीच उनकी नागरिकता छिन जाने की अफवाह फैलाई जा रही है।
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