आईसीएमआर की टीम ने बरेली के दस गांव क्लस्टर बनाकर शुरू किया शोध कार्य
बरेली। कीटनाशकों का असर कहें या जैविक परिवर्तन, मगर अब मच्छर भी चालाक हो गए हैं। वे मनुष्यों का खून चूसने के बाद दीवारों पर नहीं बैठ रहे हैं, बल्कि झाड़ियों में जाकर छिप जाते हैं। विशेषज्ञों की ओर से यह दावा किए जाने के बाद आईसीएमआर की टीम ने अब देश के सर्वाधिक प्रभावित राज्यों के अतिसंवेदनशील रहे इलाकों में मच्छरों के बदले स्वभाव पर शोध शुरू कर दिया है। बरेली पहुंची टीम ने 10 गांवों को क्लस्टर बनाकर स्वास्थ्य विभाग के सहयोग से पड़ताल शुरू कर दी है।
स्वास्थ्य विभाग से प्राप्त जानकारी के मुताबिक, इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की टीम मंगलवार को बरेली पहुंची थी। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत क्लस्टर के तौर पर चयनित 10 गांवों में बुधवार से शोध कार्य शुरू किया है। बीते वर्षों में देश भर के सभी मलेरिया प्रभावित राज्यों के जिलों में शोध के लिए टीम पहुंच रही है। वर्ष 2018 में बरेली प्रदेश का सर्वाधिक मलेरिया प्रभावित जिला रहा था। आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में करीब 74 हजार मलेरिया पीड़ित थे, इनमें 37482 केस बरेली में ही दर्ज हुए थे। प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम के 14 हजार मामले मिले थे। दो सौ से ज्यादा मलेरिया संदिग्धों की मौत हुई थी।
बताते हैं कि असम और ओडिशा में शोध के बाद टीम अब बरेली पहुंची है। मलेरिया प्रभावित गांवों में मच्छरों की प्रवृत्ति का अध्ययन करना शुरू कर दिया है। दरअसल, मच्छर जैविक व्यवहार के तहत मनुष्यों को काटने के बाद दीवार पर बैठते हैं, लेकिन अब तेजी से उनके स्वभाव में परिवर्तन आ रहा है। मच्छर अब काटने के बाद दीवार पर बैठने के बजाय छिपने के लिए झाड़ियों की तरफ भागते हैं। मच्छरों के स्वभाव में इस परिवर्तन की वजह क्या है। क्या यह कीटनाशकों के असर का प्रभाव है, आदि सवालों के जवाब तलाशे जा रहे हैं।
प्रवृत्ति बदलने को लेकर पूर्व में हुआ था सर्वे
अधिकारियों के मुताबिक, बीते दिनों राष्ट्रीय मलेरिया अनुसंधान केंद्र की टीम ने मच्छरों के बदलती प्रवृत्ति पर शोध किया था। कुछ क्लस्टर में इसकी पुष्टि होने के बाद पूरे देश में यह शोध करने का जिम्मा आईसीएमआर को मिला। मझगवां के लोहारी और अमरौली, रामनगर के देवकोला और अयोध्या, मीरगंज के लभेड़ा और दुर्गाप्रसाद, क्यारा, भमोरा, खिवराजपुर और तुसारी गांव क्लस्टर बनाए गए हैं।
इसलिए किया जाता है कीटनाशक का छिड़काव
जिला मलेरिया अधिकारी डीआर सिंह के मुताबिक मनुष्यों को काटने के बाद अमूमन मच्छर घर की दीवारों पर बैठ जाते हैं, इसलिए दीवारों और कमरे के किनारों पर जहां छिपने की जगह हो वहां डीडीटी का छिड़काव कराया जाता है। कहा जा रहा है कि अब काटने के बाद मच्छर जंगल-झाड़ियों में भाग रहे हैं। यह स्थिति बरेली में भी है या नहीं, इसी का अध्ययन करने के लिए आईसीएमआर की टीम बरेली पहुंची है।
मच्छरों की प्रवृत्ति समेत होगी जीनोम सीक्वेंसिंग
पिछले चार सालों में प्रतिवर्ष दर्ज हुई मलेरिया पीड़ितों की तादाद और संवेदनशील इलाकों की जानकारी टीम को जिला मलेरिया विभाग ने दे दी है। इसी के अनुसार टीम गांवों में पहुंचकर वहां तड़के और शाम छह बजे के बाद मच्छरों की प्रवृत्ति का अध्ययन करेगी। उन्हें पकड़कर स्टडी के लिए जीनोम सीक्वेंसिंग भी होगी।
मच्छरों की जैविक प्रवृत्ति में हो रहे बदलाव और कीटनाशकों के प्रभाव पर शोध के लिए टीम आई है। मलेरिया की रोकथाम के लिए की जा रही कवायद की जानकारी दी गई है। गांव में शोध के लिए स्वास्थ्य विभाग क ी टीम आईसीएमआर की टीम का सहयोग कर रही है। - डॉ. बलवीर सिंह, सीएमओ