कभी शहर के हर मोहल्ले में हुआ करते थे अखाड़े, अब बचे सिर्फ दस
बरेली। कभी शहर की पहचान रहे अखाड़े अब इतिहास बनते जा रहे हैं। कुश्ती को लेकर युवाओं का जोश फीका पड़ गया है। आधुनिक कुश्ती मैट पर लड़ी जा रही है। ऐसे में अखाड़े सूने होते जा रहे हैं। अब यहां दंगल के नगाड़े नहीं बजते। पहलवानों की जगह पुरानी यादें ही यहां ताल ठोक रही हैं। पहले जहां शहर के हर मोहल्ले में अखाड़े हुआ करते थे, अब शहर में सिर्फ 10 ही बचे हैं।
कुश्ती संघ बरेली के अध्यक्ष हरीश पाल के मुताबिक, शहर ने एक दौर में मिंटू, सुनील और योगेंद्र जैसे राष्ट्रीय स्तर के पहलवान दिए हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ऐसा कोई नाम सामने नहीं आया है। वर्तमान में जिले में कुल 100 पंजीकृत पहलवान हैं। इनमें से भी चंद खिलाड़ियों के पास ही फेडरेशन का आईडी कार्ड है। कुश्ती की लोकप्रियता कम होने की सबसे बड़ी वजह है डाइट और इस पर होने वाला खर्च। पहलवानों के लिए दूध, घी, बादाम, फल आदि पर प्रतिदिन 800 से 1000 रुपये तक का खर्च आता है। यह हर किसी के बस की बात नहीं है। आधुनिक कुश्ती में मैट का इस्तेमाल अनिवार्य होने से भी अखाड़ों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।
पहले शान की बात होती थी पहलवानी
बुजुर्गों के मुताबिक, पहले कोई लड़का पहलवानी करे तो पूरे गांव सहित इलाके के लोगों को उस पर गर्व होता था। मेलों में होने वाले दंगल में दूर-दराज से पहलवान आते थे। चंद मिनट की कुश्ती देखने के लिए हजारों की भीड़ जुटती थी। पहलवानों को दूध, बादाम, देसी घी मुफ्त में खाने के लिए मिलता था, पर अब हालात बदल चुके हैं। शहर का सबसे मशहूर तिवारी अखाड़ा अब वीरान पड़ा है। संवाद