राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष और भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन ने कहा कि बारिश से बर्बाद फसल के कारण प्रभावित किसानों को जान देने से रोकने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। किसानों को सरकार पर्याप्त मुआवजा दें, ताकि उनको राहत मिल सके। वे किसान भी पूरा मुआवजा पाने के हकदार हैं, जिन्होंने दूसरे की जमीनों को ठेके पर लेकर फसल उगाई, क्योंकि नुकसान उन्हें भी हुआ। भूमिहीन होने की वजह से उन्हें मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता।
मंगलवार को इन्वर्टिस यूनिवर्सिटी के प्रथम दीक्षांत समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शामिल होने आए न्यायमूर्ति बालकृष्णन ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि यूपी में मानवाधिकार उल्लंघन के सबसे ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं। आयोग को यहां से हर दिन ही तमाम शिकायतें मिलती रहती हैं। अफसोस की बात यह है कि अधिकांश मामले पुलिस की ओर से मानवाधिकारों के उल्लंघन के हैं। आयोग इनको गंभीरता के साथ संज्ञान में ले रहा है और ऐसे मामलों में कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने बताया कि नक्सली हमलों में मारे जाने वाले पुलिस कर्मियों के परिजनों को भी पर्याप्त मुआवजा दिलाने के लिए आयोग ने राज्यों को कहा है। न्यायमूर्ति ने कहा कि स्कूली बच्चों के लिए लागू मिड-डे मील योजना योजना में कुछ सामाजिक समस्याएं भी हैं। कई स्थानों पर बच्चों को पौष्टिक आहार के रूप में अंडे आदि खिलाने पर उनके परिजनों को आपत्ति है। बतौर चीफ जस्टिस अपने कार्यकाल में बालकृष्णन ने ही देश में स्कूली बच्चों के लिए मिड-डे मील योजना लागू करने के आदेश केंद्र सरकार को दिए थे। मुस्लिमों को मताधिकार से वंचित करने को लेकर शिवसेना के मुखपत्र में छपे लेख के संबंध में उन्होंने कोई कमेंट करने से इंकार कर दिया।