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बरेली चुनावः वोट किसे दें, यह बताना उलमा का काम नहीं

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बरेली। मुस्लिम मतदाताओं पर इस बार किसी उलमा या कथित रहनुमाओं की अपील का असर नहीं दिखा। पोलिंग बूथों पर कतारों में खड़े कई मुस्लिम मतदाताओं ने कहा कि वे अपने दिल की आवाज पर मतदान करेंगे। यह बताना उलमा का काम नहीं है कि वे किसे वोट दें।
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मुस्लिम मतदाताओं ने नाम न छापने की गुजारिश के साथ स्वीकार किया कि वे पहले उलमा के कहने पर वोट देते रहे हैं लेकिन अब मुस्लिमों की यह मानसिकता बदलने लगी है। आम मुसलमान भी यह मानने लगा है कि उलमा का मान-सम्मान अपनी जगह है। मजहबी कामों में उनकी हिदायत मंजूर है लेकिन सियासी मामलों में उन्हें अपनी राय थोपने का कोई हक नहीं है। मुसलमान अब खुद समझने लगा है कि उसके लिए क्या ठीक है और क्या नहीं।
कुछ मतदाताओं ने कहा कि अगर किसी उलमा को राजनीति करनी है तो खुलकर करें। पर्दे के पीछे से की गई अपीलों पर मतदान करने से आज तक मुसलमानों का भला नहीं हो पाया। उनके वोटों का बंटवारा अलग हो जाता है। उन्होंने कहा कि उनका किसी पार्टी से बैर भी नहीं है, मगर इतना जरूर चाहते हैं कि ऐसी सरकार आए जो सबको साथ लेकर चले। देश-प्रदेश का विकास हो, सबके हाथ में काम हो और महंगाई पर लगाम रहे। शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं भी सुधरनी चाहिए। संवाद
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