चीन, वियतनाम, म्यांमार, थाइलैंड नेपाल ईरान समेत 60 देशों में वन्यजीवों की मौत की वजह बन रहा परजीवी ट्रिचिनेल्ला भारत में भी पहुंच चुका है। यह परजीवी जंगली सुअर का कच्चा और अधपका मांस खाने और गंदगी के जरिये मनुष्य के शरीर में प्रवेश करता है। विश्व में 150 से ज्यादा स्तनधारी प्रजातियां इससे संक्रमित हैं। देश के विभिन्न भागों में हर साल वन्यजीवों की असमय मौत की वजह ढूंढ रहे भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) के वैज्ञानिकों के मुताबिक ट्रिचिनेल्ला की प्रजाति ब्रिटोवी और नेलसोनी की मौजूदगी दुधवा और आसपास के वन्यजीवों में भी मिली है। इंसानों में इसका संक्रमण जानलेवा हो सकता है।
आईवीआरआई के परजीवी विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पीएस बनर्जी, प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रजत गर्ग और वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. हीरा राम दो साल से इस परजीवी का पता लगाने में जुटे थे। इसके लिए पशु पक्षियों के साढ़े चार सौ सैंपल लिए गए। जनवरी में पीलीभीत इलाके में जंगली सुअर और मई में बहराइच के कतर्नियाघाट में तेंदुए में इस पैरासाइट के पाए जाने के बाद अब 19 जुलाई को लखीमपुर खीरी के जंगल में मादा बाघ के शरीर में ट्रिचिनेल्ला ब्रिटोवी और ट्रिचिनेल्ला नेलसोनी परजीवी मिला है।
जांच टीम के मुख्य अन्वेषक परजीवी विज्ञान विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. हीरा राम के अनुसार ये परजीवी मानव प्रजाति के लिए भी खतरनाक है। इसके लारवा खून के माध्यम से शरीर के अलग-अलग भागों में चले जाते हैं। यह गोल कृमि है जो एक मिमी से भी छोटा होता है।
उन्होंने बताया कि शोध के दौरान परजीवी की प्रजाति का पता लगाने के लिए डीएनए की जांच पॉलीमरेज चेन रियेक्शन (पीसीआर) विधि से की गई। इसमें पता चला कि भारत के वन्यजीव ट्रिचिनेल्ला नेलसोनी और ट्रिचिनेल्ला ब्रिटोवी प्रजातियों से संक्रमित हैं। उन्होंने कहा कि चूहे में भी परजीवी अपना जीवन चक्र पूरा करता है। जंगली पशु जब चूहों का शिकार करते हैं वह इसकी चपेट में आ जाते हैं।
लक्षण और बचाव
संक्रमित होने पर रोगी को दूसरे दिन से ही उल्टी-दस्त होने लगते हैं। इससे मांसपेशियों में जकड़न, बुखार, सांस संबंधी तकलीफ, पाचन शक्ति गड़बड़ाना और आंखों के नीचे सूजन आ जाती है। ऐसे में उसे डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए। एक से डेढ़ महीने इसकी गिरफ्त में रहने से जान भी जा सकती है। इसका बचाव सावधानी और तत्काल उपचार ही है।
उत्तराखंड में मौतों के बाद हुआ शोध
अप्रैल 2011 में उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में जंगली सुअर का मीट खाने से चार महीने के अंदर 76 लोग बीमार हुए थे और 12 लोगों की मौत हो गई थी। इसका कारण जानने के लिए आईवीआरआई के निदेशक डॉ. आरके सिंह ने संस्थान के वैज्ञानिकों की टीम को इस शोध में लगाया था।
छह महीने के अंदर तीन वन्यजीवों में इस परजीवी के मिलने से शोध में तेजी आई है। हम अन्य जानवरों में भी इस प्रकार के परजीवी की खोज कर रहे हैं। यदि आईवीआरआई, वन विभाग और स्वास्थ्य महकमा मिलकर काम करें तो इसका फैलाव और नुकसान रोकने की दिशा में बेहतर काम हो सकता है। जन जागरूकता अभियान चलाने की भी जरूरत है। हम पालतू सुअरों में भी परजीवी का पता लगाने में जुटे हैं।
-डॉ. हीराराम, वरिष्ठ वैज्ञानिक परजीवी विभाग