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अगर कॉरीडोर बन गया है तो रबर फैक्टरी में और आएंगे बाघ-तेंदुए

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Bengal Tiger - फोटो : ANI
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वन्य प्राणियों में दिलचस्पी रखने वाले जानकारों का अनुमान, वन विभाग अफसरों ने खारिज की यह संभावना
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तीन सालों से पीलीभीत के जंगलों से लगातार आ रहे हैं बाघ और तेंदुए

बरेली। क्या यह सिर्फ इत्तफाक है कि रबर फैक्टरी जिसके इर्दगिर्द दूर-दूर तक कोई जंगल नहीं है, वहां न सिर्फ बाघ और तेंदुए जैसे वन्य प्राणियों की लगातार पहुंच रहे हैं बल्कि उन्हें बियावान फैक्टरी में स्थाई ठिकाना बनाना भी रास आ रहा है। करीब तीन सालों से कौतुहल की वजह बने इन सवालों पर वन विभाग ने अब तक कोई रिसर्च ही नहीं की है लिहाजा उसके अफसरों के पास इसका कोई जवाब भी नहीं है, हालांकि जानकार लोग मानते हैं कि पीलीभीत और बरेली के बीच नहर के नेटवर्क से जुड़ता हुआ कोई कॉरीडोर इन वन्य प्राणियों ने खुद ही विकसित कर लिया है और उसी के जरिये पीलीभीत से बरेली तक पहुंच रहे हैं। यह भी अनुमान है कि रबर फैक्टरी के जंगल में और भी बाघ और तेंदुए हो सकते हैं या फिर भविष्य में उनकी आमद बढ़ सकती है।
पीलीभीत के जंगल करीब 74 हजार हेक्टेयर में फैले हुए हैं जिनमें 2004 तक बाघों की संख्या सिर्फ 16 थी लेकिन अब 65 पार कर चुकी है। बाघ जंगलों से बाहर क्यों निकल रहे हैं, इस सवाल का जवाब पाने के लिए यह जानना जरूरी है कि हर नर बाघ जंगल के एक निश्चित वन क्षेत्र में राज करता है जो आमतौर पर पांच किमी के दायरे में होता है। अपनी इस टेरेटरी में वह किसी दूसरे नर बाघ को नहीं आने देता। बाघों के बीच संघर्ष की घटनाएं भी इसी सीमाक्षेत्र के उल्लंघन की वजह से होती हैं। मादा बाघ के साथ भी उसका साथ आमतौर पर प्रजनन के सीजन में ही रहता है। कई बार मादा बाघ की वजह से भी नर बाघों के बीच लड़ाई होती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पीलीभीत के जंगलों में बाघों के लिए टेरेटरी बनाने की समस्या उनकी संख्या बढ़ने के साथ बढ़ी है। इसी वजह से शुगर केन टाइगर यानी जंगल छोड़कर गन्ने के खेतों में ठिकाना बनाने बाघों की संख्या भी बढ़ी है। बरेली में रबर फैक्टरी तक बाघ पहुंचने की वजह यह हो सकती है कि गन्ने के खेतों में भी उन्हें ठिकाना न मिला हो। चूंकि बाघ नदी-नहर जैसे पानी के स्रोतों, दलदली जमीन और घासयुक्त जगह पसंद करता है लिहाजा सरकंडों के झुंड से घिरी नहर के साथ-साथ पीलीभीत से बरेली आया कोई रास्ता उसका कॉरीडोर बन सकता है। यह बहुत मुश्किल है कि पीलीभीत से बरेली तक लंबी दूरी तक आबादी वाले क्षेत्रों से गुजरकर बाघ या तेंदुआ बरेली में रबर फैक्टरी पहुंचे और रास्ते में कोई दुर्घटना भी न हो। वह भी तब जबकि रबर फैक्टरी बरेली जिले का मध्यक्षेत्र है और पीलीभीत की सीमा भी उससे काफी दूर है।

डीएफओ का तकनीकी दावा, भटककर रबर फैक्टरी आ रहे हैं जानवर

बरेली के डीएफओ भरत लाल तकनीकी तौर पर पीलीभीत और रबर फैक्टरी के बीच जानवरों का कोई कॉरीडोर बनने के दावे को सिरे से खारिज करते हैं। उनका कहना है कि ये जानवर भटककर रबर फैक्टरी पहुंच रहे हैं। कॉरीडोर उसे माना जाता है जब जानवरों की बगैर अवरोध के आसान आवाजाही एक वन क्षेत्र से दूसरे वन क्षेत्र में हो। बरेली कोई वन क्षेत्र नहीं है। पीलीभीत से आने वाले वन्य प्राणी बहेड़ी होते हुए फतेहगंज पश्चिमी पहुंच रहे हैं और रबर फैक्टरी को जंगल समझकर ठिकाना बना रहे हैं।
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वन्य प्राणियों के बारे में जानकारी रखने वाले अनिल साहनी का कहना है कि रबर फैक्टरी में तीन साल पहले भी एक तेंदुआ था। इसी दौरान एक बाघ आने के बाद तेंदुआ फैक्टरी से दूर चला गया जो आसपास के गांवों और तराई क्षेत्र में भटकता रहा। बाघ के रेस्क्यू के कुछ महीने बाद फैक्टरी में फिर एक तेंदुआ आ गया। इसके बाद अब यहां बाघिन पहुंची है। यह बाघिन संभवत: पीलीभीत के जंगलों से ही बहेड़ी होते हुए फतेहगंज रबर फैक्टरी पहुंची है। अनिल साहनी कहते हैं कि रबर फैक्टरी बंद हुए 21 साल हो चुके हैं। यहां चार सालों में लगातार वन्य प्राणियों का आना इत्तफाक नहीं है। इस बात की काफी संभावना है कि उन्होंने कोई न कोई कॉरीडोर बना लिया है। इसकी पुष्टि के लिए गहन शोध की जरूरत है।

अफसर करते रहे इंतजार, नहीं आई टीम

सोमवार को वाइल्ड लाइफ रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया देहरादून से एक टीम बाघिन को ट्रेंक्युलाइज करने के लिए बरेली आने वाली थी मगर किसी वजह से उसकी आमद टल गई। डीएफओ भरत लाल के मुताबिक टीम दोपहर बाद पहुंचने की उम्मीद थी मगर देर शाम तक उसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली। रात में जानकारी मिली कि टीम मंगलवार दोपहर तक पहुंचेगी। ब्यूरो
 
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