बरेली। इतिहास लेखन को पूर्वाग्रह और विचारधाराओं से मुक्त रखना चाहिए। प्राथमिक स्रोतों पर ध्यान केंद्रित करते हुए तथ्यों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परखना चाहिए। समय के साथ आए बदलाव को देखते हुए क्षेत्रीय भाषाओं और शब्दों के अर्थ को सरल और सटीक शब्दों में समझाने की जरूरत है। रुहेलखंड विवि में उप्र इतिहास कांग्रेस के अध्यक्ष व दिल्ली विवि के प्रो. अनिरुद्ध देशपांडे ने शनिवार से शुरू हुए 33वें राष्ट्रीय अधिवेशन में ये बातें कहीं।
उन्होंने कहा कि कई इतिहासकारों का लेखन उनकी विचारधाराओं से प्रेरित रहा। इसलिए उनके लेखन को लेकर विवाद होता रहा है। इतिहासकारों को यह समझना चाहिए कि देश के भविष्य के लिए निष्पक्ष इतिहास लेखन बेहद जरूरी है। मुख्य अतिथि रुविवि के कुलपति प्रो. केपी सिंह ने कहा कि इतिहास सबसे सुनिश्चित और समावेशी विषय है। भावी पीड़ियों की जरूरत को देखते हुए इतिहास के स्रोतों का डिजिटल तरीके से संरक्षण किया जाना चाहिए। उन्होंने इतिहास को अंतरविषयक दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता पर बल दिया।
प्रो. ओम प्रकाश श्रीवास्तव ने उप्र इतिहास कांग्रेस के प्रारंभिक दौर में आने वाली चुनौतियों को सामने रखा। उन्होंने संगठन के विकास और शोध के क्षेत्र में योगदान पर प्रकाश डाला। प्रो. एके सिन्हा ने शोध के नए आयाम पर बल दिया। प्रो. श्याम बिहारी लाल ने कहा कि यह अधिवेशन स्थानीय इतिहास लेखन के लिए एक कारगर मंच साबित होगा। उन्होंने इतिहासकारों से आह्वान किया कि वह स्थानीय इतिहास को गहराई से समझें और उसे लिपिबद्ध करें। आयोजन सचिव प्रो. विजय बहादुर सिंह यादव ने सभी का आभार जताया।
भारतीय राष्ट्रवाद के विकास में ग्रामीण समाज की भूमिका अहम
अधिवेशन के दूसरे सत्र में प्रो. रश्मि चौधरी ने कहा कि भारतीय राष्ट्रवाद के विकास में ग्रामीण समाज की भूमिका अहम रही है। प्रो. मनीषा चौधरी ने बंजारों के सामाजिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक और आर्थिक परिप्रेक्ष्य को सरल और सहज तरीके से समझाया। इस दौरान डॉ. प्रिया सक्सेना, प्रो. हर्ष श्रीवास्तव, प्रो. अवनीश मिश्र, प्रो. दिग्विजय नाथ मौर्य, प्रो. अनिल कुमार, प्रो. एमपी अहिरवार, प्रो. आराधना गुप्ता, प्रो. डीके चौबे, प्रो. आशुतोष प्रिय, प्रो. रिफाक, प्रो. वीएन वर्मा आदि मौजूद रहे। संवाद