बरेली। मानसिक बीमारी के कारण घर से निकले रमेश 27 वर्ष बाद भाई सुभाष और अन्य परिजनों से मिले। साइकोलॉजिस्ट शैलेश शर्मा और उनकी संस्था मनोसमर्पण सेवा संस्थान के प्रयास से यह संभव हो सका। इसी वर्ष फरवरी में मुंबई की एक रेलवे कॉलोनी में भटकते हुए पुलिस ने उनका रेस्क्यू किया था। इसके बाद उन्हें श्रद्धा रिहैबिलिटेशन फाउंडेशन में मानसिक उपचार के लिए भेजा गया था। वहां उन्होंने अपना नाम रमेश और मूल स्थान बरेली बताया था।
रमेश की ओर से दी गई जानकारी के आधार पर उन्हें बरेली के आंवला और फिर हासमपुर भेजा गया, लेकिन कोई ठोस कड़ी नहीं मिली। तब उन्हें मनोसमर्पण सेवा संस्थान, बरेली भेजा गया। यहां साइकोलॉजिस्ट शैलेश शर्मा ने लगातार उनकी काउंसलिंग की। इसी दौरान रमेश ने हरिद्वार के रायसी गांव और बिजनौर के नहटौर की बात की। जब टीम नहटौर पहुंची तो वहां भुगन नाम के व्यक्ति ने रमेश की पहचान अपने बहनोई के रूप में की। उनकी बहन शीला देवी से वीडियो कॉल पर बात कराई। इसके बाद 70 वर्षीय रमेश को उनके भाई सुभाष ने बरेली के रजऊ परसपुर स्थित पुनर्वास केंद्र से पहचान कर अपना लिया। संवाद
मां ने बेटे के इंतजार में तोड़ा दम
सुभाष ने बताया कि परिवार ने रमेश को मृत मान लिया था। मां माला देवी अंतिम सांस तक रमेश की राह देखती रहीं, लेकिन वह लौटे नहीं। काश मां आज जिंदा होतीं तो उनकी खुशी का ठिकाना न होता। रमेश को परिजनों को सौंपने की प्रक्रिया मनोसमर्पण संस्था के मुकुल कुमार और रंजीत मौर्य ने पूरी की।