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आला हजरत की याद में: अंग्रेजों के खिलाफ जारी फतवों का बरेली में होता था समर्थन

Mon, 11 Sep 2023 11:59 AM IST
मुकेश कुमार संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली

सार

आला हजरत का खानदान पख्तून के बड़हेच जनजाति से संबंधित थे। इनके परदादा नवाब सईदुल्ला खां अफगानिस्तान के शहर कंधार से लाहौर आए। फिर लाहौर से दिल्ली। यहां मोहम्मद शाह बादशाह की हुकूमत थी। 
 
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दरगाह आला हजरत, बरेली - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बरेली में आला हजरत इमाम अहमद रजा खां फाजिले बरेलवी का 105वां उर्स-ए-रजवी मनाया जा रहा है। आला हजरत ने जिस तरह पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाई वह एक मिसाल है। आइए जानते हैं कि आला हजरत का खानदान और बरेली सुन्नियों का मरकज कैसे बना। 

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दरअसल, आला हजरत इमाम अहमद रजा खान फाजिले बरलेवी के पिता का नाम मौलाना नकी अली खान और दादा मौलाना मुफ्ती रजा अली खान है। इन्होंने 1857 की जंगे-आजादी में हिस्सा लिया। दिल्ली से अंग्रेजों के खिलाफ जारी होने वाले फतवे का बरेली में समर्थन किया। 

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दरगाह आला हजरत के मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने बताया कि इसकी वजह से मौलाना रजा अली खां को अंग्रेजों ने गिरफ्तार करने का आदेश दिया, मगर नाकाम रहे। आला हजरत का खानदान पख्तून के बड़हेच जनजाति से संबंधित थे। इनके परदादा नवाब सईदुल्ला खां अफगानिस्तान के शहर कंधार से लाहौर आए। फिर लाहौर से दिल्ली। यहां मोहम्मद शाह बादशाह की हुकूमत थी। 

उनके बेटे मोहम्मद आजम खां को फौज में जिम्मेदारी दे दी गई। मोहम्मद आजम खां के पुत्र हाफिज काजिम अली खां को जिला बदायूं का तहसीलदार बना दिया गया। उन्हें जिला बदायूं में करतौली गांव के बाराह मजरे भी काश्तकारी के लिए हुकूमत ने दे दिए। आला हजरत के दादा यानी हाफिज काजिम अली के बेटे मौलाना रजा अली खां ने फतवा लिखने के लिए बरेली में सेंटर कायम किया। 

बड़हेच कबीले के बहुत सारे लोगों ने अफगानिस्तान से आकर उत्तरी भारत के रोहिला बिरादरी के बीच एक जनजातीय समूह बनाया। बाद में यह इलाका रोहिलखंड राज्य के तौर पर जाना गया। मुगल शासन के दौरान आला हजरत के पूर्वज रोहिलखंड राज्य में स्थापित हुए। यहां रह कर आला हजरत और उनके खानदान ने इस्लाम धर्म का प्रचार प्रसार किया। अपनी विचारधारा पूरी दुनिया में फैलाई, जिसकी वजह से बरेली सुन्नियों का मरकज बना। 

अपनी खास विचारधारा से पाई पहचान 

आला हजरत का आंदोलन लोकप्रिय सूफीवाद का बचाव करता था। ब्रिटिश काल के दौरान दक्षिण एशिया में कहीं देवबंदी, कहीं वहाबी प्रचार का प्रभाव बढ़ गया था। उस दौर में आला हजरत ने बरेलवी मसलक (मत) का आगाज किया। धीरे-धीरे यह आंदोलन भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की, अफगानिस्तान, इराक, श्रीलंका, दक्षिण अफ्रीका, संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन के अन्य देशों के अनुयायियों के साथ दुनिया भर में फैल गया है। 
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यह आंदोलन शिक्षित भारतीयों और पाकिस्तानियों के साथ-साथ दुनिया भर में दक्षिण एशियाई मुल्कों के बीच लोकप्रिय है। कई धार्मिक स्कूल, संगठन और शोध संस्थान आला हजरत के विचारों को पढ़ते हैं। सूफी प्रथाओं और पैगंबर-ए इस्लाम को व्यक्तिगत भक्ति के अनुपालन में  इस्लामी कानून की प्राथमिकता पर जोर देते हैं। 
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