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अब ट्रायल के लिए स्पेन से आएगा टेल्गो इंजन

Tue, 31 May 2016 01:33 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला बरेली
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टेल्गो ट्रेन
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हाई स्पीड पर ट्रायल कराने के लिए टेल्गो ट्रेन अपने ही इंजन से चलेगी। यह ट्रायल तेज रफ्तार में पलवल - मथुरा और मुंबई तथा दिल्ली के बीच में होगा। यदि भारतीय इंजन को लेकर ट्रेन को खींचा तो इन दोनों ट्रायल के दौरान ट्रेन हाई स्पीड में होने के कारण कई व्यावहारिक और तकनीकी दिक्कतें भी हो सकती हैं। इसीलिए स्पेन से इंजन मंगाया जा रहा है।
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4500 एचपी के भारतीय इंजन से टेल्गो ट्रेन के संचालन के दौरान तकनीकी टीम ने व्यावहारिक दिक्कतें महसूस की हैं। जिनकी वजह से अपनी कंपनी के इंजन की जरूरत महसूस की गई है, इस बारे में स्पेन स्थित टेल्गों के अधिकारियों को बता दिया गया है। उसी के आधार पर संकेत मिले हैं कि जल्द ही वहां से इंजन आएगा। साथ में चार ड्राइवरों के भी आने की संभावना है।
टेल्गो की तकनीकी टीम का मानना है कि ट्रेन को दौड़ाने के समय हाइड्रोलिक सिस्टम से कोच को डेढ़ फीट ऊंचा करने में दिक्कत आती है। हालांकि ट्रेन संचालन के समय कोच स्वत: ही ऊंचे हो जाते हैं। प्लेटफार्म पर यह कोच स्वत: ही नीचे हो जाते हैं। भारतीय इंजन सामान्य है जबकि टेल्गो का इंजन पूरी तरह से कंप्यूटराइज्ड है। वह सेंसर के माध्यम से यह भी संकेत देता है कि जिस ट्रैक पर वह दौड़ रहा है, इसके आगे का ट्रैक कैसा है। उसी आधार पर ड्राइवर ट्रैक पर ट्रेन की स्पीड को कम और अधिक करते हैं। ट्रेन के कोच के बारे मे भी इंजन में बैठे ड्राइवर को सेंसर तथा अन्य उपकरणों के माध्यम से कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती रहती हैं। इसी वजह से कई मोड़ और घुमाव वाले पलवल-मथुरा और दिल्ली - मुंबई ट्रैक पर अधिक स्पीड में इस ट्रेन को दौड़ाने के लिए आधुनिक तकनीक से इंजन को इस्तेमाल करने की जरूरत महसूस की गई है।
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रविवार को इज्जतनगर से बरेली जंक्शन और मुरादाबाद के बीच स्पेन की हाई स्पीड ट्रेन टेल्गो के पहले दिन का ट्रायल सक्सेस माना गया है। यह संकेत आरडीएसओ की टीम ने सेंसर रिपोर्ट के आधार पर दिए हैं। टीम असली परीक्षा तो दिल्ली-पलवल और मथुरा के बीच मान रही है, यहां पर सांप - सीढ़ी के खेल की तरह के कई कई मोड़ हैं। जहां पर 170 से 200 की स्पीड से ट्रेन को दौड़ाना चुनौैती हो सकता है। हालांकि टेल्गो की टीम इस चुनौती को सामान्य मान कर चल रही है। टीम का तर्क है कि इस तरह के मोड़ पर इस तकनीकी की ट्रेन को संचालित करना दूसरे देशों में आम बात है। आरडीएसओ की टीम ने पहले दिन इज्जतनगर से बरेली जंक्शन और मुरादाबाद तथा वहां से इज्जतनगर वापसी के ट्रायल के सेंसर डाटा का परीक्षण किया। जिसके आधार पर प्रथम दृष्टया पहले दिन का ट्रायल सक्सेस (संतोषजनक ) बताया गया है। ट्रायल के दौरान जिनको लेकर आशंका थी और सवाल थे, उन सभी को सेंसर किया गया था। हालांकि सेंसर की विस्तृत जांच नहीं हुई है। पूरी जांच एक सप्ताह तक ट्रायल होने के बाद हो पाएगी। अब तक जो रिपोर्ट आई है उसके अनुसार ट्रेन के चलने के दौरान झटके नहीं लग रहे हैं। अधिक स्पीड पर ट्रेन निर्बाध गति (झटके और कंपन के बिना) से चलती है। कोच हल्के और सिस्टम हाइड्रोलिक होने के कारण इंजन का पावर भी कम इस्तेमाल हो रहा है। पटरी, और पहिए का घिसाव भी कम है।  ट्रायल के आखिरी दिन तक ट्रेन में सेंसर लगा रहेगा और उसकी प्रतिदिन की रिपोर्ट का परीक्षण होगा। उसी के आधार पर ट्रेन के ट्रायल में समय - समय पर संशोधन होता रहेगा।

टेल्गो टीम ने देखा पलवल मथुरा ट्रैक
टेल्गो के इंजीनियरों की टीम कई मोड़ वाले दिल्ली से पलवल और मथुरा ट्रैक का निरीक्षण कर आई है। यहां तक जानकारी कर ली गई है कि कितने किलोमीटर पर कितने घुमाव का मोड़ है और उस मोड़ पर ट्रेन की स्पीड को कम करना होगा या नहीं। हालांकि टीम का तर्क है कि इस तरह के मोड़ पर स्पीड पर कोई असर नहीं पड़ेगा लेकिन ट्रैक बिजी न हो और लाइन क्लियर मिलनी चाहिए।

110 की स्पीड से दलपतपुर तक दौड़ी टेल्गो
दूसरे दिन टेल्गो बरेली -मुरादाबाद के बीच खूब दौड़ी लेकिन कमी यह रही कि मुरादाबाद में प्लेटफार्म और ट्रैक खाली न होने के कारण दलपतपुर से ही वापस लौटना पड़ा। यह स्थिति एक बार नहीं बल्कि दोनों बार हुई। इंजन के ड्राइवर, गार्ड, ट्रैफिक कंट्रोलर सहित स्पेन के इंजीनियरों की टीम ने प्रयास किए कि मुरादाबाद में प्लेटफार्म तक ट्रेन पहुंचे। क्योंकि ट्रेन का स्टाफ मुरादाबाद स्टेशन पर चाय और काफी का लुत्फ उठाना चाहता था।
टेल्गो ट्रेन सोमवार सुबह साढ़े सात बजे इज्जतनगर वर्कशाप से बरेली जंक्शन के लिए रवाना हुई। इस ट्रेन को बरेली से मुरादाबाद के लिए रवाना होना था। निर्धारित समय नौ बजे मुरादाबाद के लिए रवाना हुई लेकिन उसके लिए कोई प्लेटफार्म खाली नहीं रहा। इसीलिए इसे दलपतपुर से बरेली के लिए वापस कर दिया गया। यही स्थिति दोबारा हुई, इस बार भी ट्रेन दलपतपुर से बरेली के लिए वापस कर दी गई। किलोमीटर कम होने के कारण तीसरी बार इस ट्रेन को परसाखेड़ा तक के लिए रवाना किया। वहां से फिर बरेली आई और उसके बाद इस ट्रेन को फिर से इज्जतनगर स्थित वर्क शाप में शिफ्ट कर दिया। ट्रेन का इसी तरह  दलपतपुर तक ट्रायल होता रहेगा।

‘मुरादाबाद रेलवे स्टेशन और प्लेटफार्म पर ट्रेनों की संख्या अधिक होने के कारण अधिक समय तक ठहराव की स्थिति नही है। इसलिए ट्रेन के लिए अब दलपतपुर तक के लिए ट्रेक दिया गया है।’ -डीआरएम मुरादाबाद 

‘टेल्गो का ट्रायल अच्छा रहा है। हमारे पुराने ट्रैक पर बेहतर और बिनी किसी कंपन और झटके के आसानी से चल रही है। जिसमें ट्रैक का घिसाव कम होता है। सेंसर होने के कारण ट्रेन और ट्रैक छिटपुट कमियों का पता चल जाता है। जिनको समय रहते सही क र लिया जाता है।’ -आरएम जौहरी,  मुख्य ट्रैफिक नियंत्रक, पूर्वोत्तर रेलवे   
रुट                             समय                           स्पीड 
इज्जतनगर वर्कशाप से बरेली  7.03 बजे (15 मिनट)   -------------------
बरेली जक्शन से दलपतपुर    9.00 (70 मिनट )   090 कि लोमीटर प्रति घंटा
दलपतपुर  से बरेली       12.55 (65 मिनट )  100 किलोमीटर प्रतिघंटा
बरेली जंक्शन से दलपतपुर    02.00 (65 मिनट)    100 किलोमीटर प्रतिघंटा
दलपतपुर से बरेली जंक्शन      05.00 ( 60 मिनट) 110 किलोमीटर प्रति घंटा
बरेली जंक्शन से परसाखेड़ा     06.00 (15 मिनट)    --------------------
परसाखेड़ा से बरेली-इज्जतनगर   09.00 (25 मिनट)----------------------

हाईस्पीड में ट्रेन के चलने का अहसास नहीं होता 
बरेली। टेल्गो ट्रेन के गार्ड एसके दास और रंजीत कुमार का कहना है कि टेल्गो ट्रेन के तेज गति से दौड़ने के वक्त यह नहीं पता चलता कि अधिक स्पीड में दौड़ रही है। न तो ट्रैक की आवाज आती है और न ही किसी भी तरह का कंपन होता है। कम स्पीड में यह अहसास जरूर होता है कि ट्रेन चल रही है। इसीलिए ट्रेन के आने और जाने की सूचना देने के लिए ट्रेन के हरेक कोच में आधा दर्जन एलईडी टीवी लगे हैं। जिनके माध्यम से यात्रियों को जानकारी होती है कि इस समय उनकी ट्रेन किस स्टेशन को क्रास कर रही है। अगला स्टेशन कौैन सा आएगा और उसके आने में कितनी देरी है और कितने किलोमीटर दूर है। गार्ड के कोच में भी टीवी है,जिसके माध्यम से गार्ड को पूरी जानकारी होती है।

थोड़ी सी लापरवाही पर  15 मिनट रुकी टेल्गो
बरेली। आरडीएसओ की टीम ने सेंसर को चेक करने के लिए दो कोच का बाक्स खोला और ठीक से बंद नहीं हुआ तो टेल्गो ट्ेन के कंट्रोल रूम का अलार्म बज गया। बाद में टेलगो के इंजीनियरों ने हरेक कोच तो चेक किया तब पता चला कि दो कोच के बाक्स का कवर ठीक से बंद नहीं हुआ था। इस जानकारी के होते ही आरडीएसओ की टीम को कोच के बाक्स के कवर को कसने के लिए सीढ़ी के साथ बुलाया। जिसे सही करने में करीब पंद्रह मिनट का समय लग गया। जबकि इससे पहले ट्रेन को रवाना करने के लिए ग्रीन सिग्नल दे दिए गए थे। बाद में सिग्नल रेड कराए गए, पंद्रह मिनट के बाद ट्रेन रवाना हुई।

वाराणसी से मंगाए हैं हाई पावर इंजन
पूर्वोत्तर रेलवे के पास हाईपावर इंजन नहीं थे, इसीलिए इस ट्रेन को दौड़ाने के लिए वाराणसी से दो इंजन मंगाए गए। इनमें से एक इंजन को आगे तो दूसरे इंजन को पीछे लगाया गया है। जिनके कुछ सिस्टम में सेंसर भी लगा हुआ है। इन इंजनों के साथ टेल्गो के ड्राइवर भी रहते हैं।
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