प्रशासन और नगर निगम के अधिकारियों का यही रवैया रहा तो कुछ दिन बाद शहर में तालाब ढूंढते रह जाएंगे और ज्यादा बारिश होते ही बीते दिनों की तरह जगह-जगह जलभराव नजर आएगा। मगर, हालात तो ये हैं कि शहर के आम और खास सभी की सरकारी जमीनों पर नजर है। अफसरों से साठगांठ करके नगर निगम की अरबों की जमीनों पर कब्जा कर लिया गया है। तालाबों को पाटकर कॉलोनियां बसा दी गई हैं। जो तालाब बचे भी हैं, उन पर भूमाफिया की नजर है। जिला कोऑपरेटिव फेडरेशन के अध्यक्ष महेश पांडेय एडवोकेट की शिकायत पर कमिश्नर के कहने पर अपर आयुक्त (प्रशासन) रामसूरत पांडेय ने डीएम को जांच कराने का आदेश दिया है। सरकारी अमला कैैसे जांच करता है, यह हम भूमाफिया की टॉप-10 लिस्ट के प्रकरण में देख चुके हैं। इसीलिए सत्यता जानने को अमर उजाला टीम ने पड़ताल की, जिससे इस मामले में कोई निर्दोष शिकार न बनाया जा सके।
सिकुड़ता जा रहा है विकास भवन के पीछे वाला तालाब
विकास भवन के पीछे कभी कस्बा हाफिजपुर के नाम से 40 हजार वर्ग मीटर से ज्यादा का तालाब हुआ करता था। इस तालाब के आसपास कॉलोनियां बननी शुरू हुईं तो इसका आकार सिकुड़ता गया। तमाम बड़े लोगों ने तालाब के आसपास घर बना लिए। शराब के कारोबार से जुड़े एक बड़े व्यक्ति का घर भी इसी इलाके में है। शिकायतें होने पर 1994 में एक लेखपाल की कब्जे कराने के आरोप में नौकरी चली गई। कानूनगो निलंबित हो गया था, लेकिन किसी कब्जेदार के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई।
हजियापुर में तालाब पर कब्जे
हजियापुर में कू ड़ाघर और उसके आसपास की जमीन सोना है। जिन लोगों को मौका मिला उन्होंने कब्जा करके बेच भी दी। कू़ड़ा बीनने वाले भी इस जमीन पर कब्जा करते जा रहे हैं, लेकिन कोई रोक टोक नहीं है। कूड़े के ढेर से खड़े होकर देखो तो हकीकत आपको खुद नजर आ जाएगी। सामने ही तालाब है, इसमें जलकुंभी भी है। इसके आगे के तालाब की बेशकीमती जमीन पर एक नेता ने कॉलोनी बसा डाली। दरअसल, निगम को अपनी इस बेशकीमती जमीन की जरा भी परवाह नहीं है।
पटता जा रहा है जलमग्न इलाका
कमिश्नर के आदेश पर टीम जांच करेगी कि स्टेडियम रोड पर ब्रह्मपुरा, जगतपुर लाला बेगम और बिहारमान नगला गांव का तालाब से लगा करीब सात लाख 56 हजार वर्ग मीटर का जलमग्न इलाका था, वह कम कैसे हुआ? इस इलाके में कुछ कॉलोनियां बनकर खड़ी हो गईं। कॉलोनाइजर का कहना है कि यह जमीन खेती की है और हमारे पास उसके बैनामे हैं। इस जमीन पर मिट्टी का भराव कराया जा रहा है। आसपास के लोग भी इस बेशकीमती जमीन पर लगातार कब्जा कर रहे हैं।
डेलापीर तालाब भी अवैध कब्जों की जद में
नगर निगम के अधिकारी डेलापीर तालाब पर भी कब्जे होने से नहीं रोक पाए। तालाब की करोड़ों की जमीन पर अब तक कब्जा हो चुका है। तालाब के आगे सड़क किनारे भी कब्जेदार बढ़ते ही जा रहे हैं। सड़क से सामने की तरफ देखो तो आपको खुद ही तालाब पटता नजर आएगा। निगम पहले से ही तालाब को लेकर कोई अच्छी प्लानिंग कर लेता तो यहां कोई पार्क या अन्य मनोरंजन केंद्र बनाया जा सकता था। तालाब के सामने की निगम की करोड़ों की जमीन पर भी शहर की एक बड़ी हस्ती पर कब्जे का आरोप है।
निगम की जमीन पर बन गई कॉलोनी
केके अस्पताल रोड पर उदयपुर खास की एक लाख वर्ग मीटर जमीन पर बिल्डरों ने कालोनी बना दी। निगम के अफसरों से साठगांठ करके यह जमीन कोड़ियों में शहर का विकास कराने के नाम पर ली गई थी। इस जमीन को लेकर उस समय निगम के कई कर्मचारियों पर उंगली भी उठी थी। पूर्व मेयरों की भूमिका पर भी जमीनों पर कब्जों को लेकर सवाल खड़े होते रहे हैं।
पीलीभीत बाईपास पर भी तालाबों पर बन गई कोठियां
पीलीभीत बाईपास रोड पर कई कॉलोनियों में तालाबों को पाटकर बेच दिया गया। तालाबों में कोठियां बनी खड़ी हैं, लेकिन नगर निगम को इसकी परवाह नहीं है। इसी रोड पर नहर की जमीन पर एक नामी होटल और अस्पताल भी बना हुआ है। कई कॉलोनियों से होकर नहर गुजरती थी, लेकिन सिंचाई विभाग के अधिकारी सरकारी जमीन से कब्जा हटवाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। कई जांच रिपोर्ट भी विभागों में फुटबाल बनी हैं।
निगम में शामिल 48 गांवों की सरकारी जमीन भी क ब्जा ली
महानगर बनने के समय बरेली शहर में 48 गांवों को शामिल किया गया था। उन गांवों की जमीन गजट होते ही नगर निगम की संपत्ति हो गई थी, लेकिन निगम अपनी करोड़ों की संपत्ति की हिफाजत नहीं कर पाया। गांवों के दबंगों ने सरकारी जमीनों पर कब्जा कर लिया। नदौैसी, स्वालेनगर, सुर्खा बानखाना, छोटी बिहार, नकटिया आदि इलाकों में सरकारी जमीनों पर कब्जे हैं।