मुसलमान जोश-ओ-खरोश के साथ आजादी का जश्न मनाएं और शान से तिरंगा लहराएं, मगर मदरसों में राष्ट्रगान न गाएं। मदरसों के प्रबंधकों व संचालकों से यह अपील दरगाह आला हजरत बरेलवी मरकज से जुड़े संगठन जमात रजा मुस्तफा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं शहर काजी शहजादा-ए-ताजुश्शरिया मौलाना असजद रजा खां ने की है।
उन्होंने प्रदेश की योगी हुकूमत की ओर से मदरसों में 15 अगस्त के मौके पर राष्ट्रगान गाने और मदरसों की वीडियोग्राफी कराने के फैसले के बाद इस संबंध में बयान भी जारी किया है। असजद रजा खां ने बयान में कहा है कि मदरसों के प्रबंधक एवं संचालक 15 अगस्त पर स्वतंत्रता दिवस पर शान से तिरंगा फहराएं, सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा... तराना गाएं। हमेशा की तरह मिठाई बांटकर जश्न मनाएं। जंग-ए-आजादी में जिन लोगों ने कुरबानियां दीं, उनको याद करें।
मौलाना असजद ने कहा कि हिंदुस्तान एक जम्हूरी मुल्क है। यहां पर हर मजहब और मिल्लत के लोगों को अपनी मजहबी पहचान के साथ जीने का हक है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि किसी भी मजहब के लोगों को इजाजत नहीं कि वो दूसरे को उसके मजहब के खिलाफ कोई काम करने पर मजबूर करे।
हिंदुस्तान में अंग्रेज आए और अपनी मक्कारी से यहां के हुक्मरां बन गए। सबसे पहले अंग्रेजों के खिलाफ अल्लामा फज्ले हक खैराबादी ने दिल्ली की जामा मस्जिद से जिहाद के लिए फतवा दिया। पूरे मुल्क के हिंदू-मुसलमान तन, मन और धन से अंग्रेजों के खिलाफ सरफरोशी का जज्बा लिए मैदान में कूद पड़े।
मुफ्ती किफायत उल्ला कैफी, मुफ्ती इनायत अहमद कंकरालवी, रुहेला पठान हाफिज रहमत खां, मौलाना रजा अली खां, टीपू सुल्तान जैसे सैकड़ों मुसलमान ने मुल्क के लिए अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी। आज वो लोग मुसलमानों को शक की निगाह से देख रहे हैं जिनके कार्यालयों पर कभी तिरंगा नहीं फहराया गया। जिन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेजों का साथ दिया।
शहर काजी ने कहा कि मुसलमान हर वो काम करें जिसकी शरीयत उनको इजाजत दे और जिसे मना करे उनसे परहेज करें।
यह है राष्ट्रगान न गाने की वजह
राष्ट्रगान के कुछ शब्दों में खुदाई दावा है इस लिए इस पर एतराज आता है। इसी बिना पर इसे मदरसों में न गाने का आह्वान किया गया है।
मौलाना असजद रजा खां, शहर काजी