मीरगंज तहसील में नहीं मिल रही फाइल, अफसर बोले- खोज रहे हैं
बरेली। बरेली-मुरादाबाद नेशनल हाईवे के चौड़ीकरण के लिए ज्यादा भूमि का अधिग्रहण करके कम मुआवजा दिए जाने के किसानों के आरोपों के बीच अधिग्रहीत भूमि की फाइल ही गायब हो गई है। इस सूचना अफसरों में खलबली मच गई है। अफसर किसानों के आरोपों को गलत बताते हुए फाइल तलाश कराने की बात कह रहे हैं।
करीब सात साल पहले बरेली-मुरादाबाद नेशनल हाइवे बनाने के लिए भूमि अधिग्रहीत की गई थी। निर्माण का काम भी पूरा हो चुका है। बताते हैं कि इस सेक्शन के 262 किलोमीटर तक सड़क को फोरलेन करने के लिए मीरगंज तहसील क्षेत्र में अधिग्रहीत की गई जमीनों के विभिन्न गाटा नंबर राजस्व रिकॉर्ड में अब तक भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी एनएचएआई के नाम दर्ज नहीं किए गए हैं। एनएचएआई के अफसर कई बार विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी कार्यालय को पत्र भेजकर इस बारे में अनुरोध भी कर चुके हैं। इसके बावजूद यह मामला टलता आ रहा है। पिछले दिनों विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी ने मीरगंज के तहसीलदार को अधिग्रहीत भूमि को एनएचएआई के नाम दर्ज कराने का निर्देश दिया तो पता चला कि भूमि अधिग्रहण की फाइल ही गायब है।
25 गांवों के सैकड़ों किसानों की जमीन का हुआ था अधिग्रहण
बताया जा रहा है कि हाइवे के चौड़ीकरण के लिए करीब 25 गांवों के दो हजार से ज्यादा किसानों की जमीनें अधिग्रहण की गई थीं। 2013 में प्रशासन ने जमीन के सर्किल रेट से तय हुए मुआवजे में फेरबदल करने पर किसानों ने आपत्ति जताई थी। इसके बाद किसानों की समस्या का निस्तारण कर अधिग्रहण के समय के ही सर्किल रेट के आधार पर मुआवजा देने का आश्वासन दिया गया। कई किसानों का आरोप है कि उनकी जमीन ज्यादा ले ली है और भुगतान भी नहीं किया।
फाइल गायब होने की सूचना गलत है, उसे तलाश किया जा रहा है। तहसीलदार को राजस्व अभिलेखों में एनएचएआई का नाम दर्ज कर वाद खतौनी की एक कॉपी भी मांगी है। - मदन कुमार, सिटी मजिस्ट्रेट
बरसों से दबा पड़ा है सितारगंज हाईवे को भूमि अधिग्रहण में हुआ घपला
बरेली। नेशनल हाईवे- 74 के बरेली से सितारगंज तक के हिस्से के चौड़ीकरण के लिए भूमि अधिग्रहण के दौरान बड़े पैमाने पर हुए घपले की जांच अब तक पूरी नहीं हो पाई है। पिछले साल इस मामले में कई बड़े अफसरों के साथ कलक्ट्रेट के कुछ बाबुओं के भी शामिल होने का खुलासा हुआ था। मामला मुख्यमंत्री तक भी पहुंचा था। इस हाईवे को टू लेन से अब फोरलेन बनाने के लिए दोबारा भूमि अधिग्रहण का मामला भी इस घपले की वजह से पचड़े में पड़ गया था।
बरेली से सितारगंज हाईवे को सात मीटर से दस मीटर चौड़ा करने के लिए 2012-13 में एनएचएआई को प्रशासन ने बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण कराया था। बाद में शासन से शिकायत हुई कि कई तत्कालीन अफसरों ने नियमों को ताक पर रखकर मुआवजे का भुगतान कराया है। बहेड़ी के पास हथमना, सिरसा और माधोपुर गांवों में कृषि भूमि को व्यावसायिक दिखाकर सर्किल रेट से कई गुना ज्यादा मुआवजा दिला दिया गया। इसमें घोटाले में अफसरों के साथ कलक्ट्रेट के कुछ बाबू भी शामिल थे। पूर्व कमिश्नर डॉ. पीवी जगनमोहन ने दो साल पहले शासन को इसकी जांच रिपोर्ट भेजी थी लेकिन वह शासन में ही दबकर रह गई। पिछले साल इस मामले में एसएलओ दफ्तर के सिर्फ एक अमीन को हटाया गया। करोड़ों के घोटाले में कौन अफसर और बाबू शामिल थे, यह आज तक पता नहीं लग पाया।
आशंका: सितारगंज हाईवे की तरह तो भूमि अधिग्रहण में नहीं हुई गड़बड़
सितारगंज हाईवे के लिए जमीन अधिग्रहण घोटाले में जमीन के सर्वे से असंतुष्ट एनएचएआई ने कई किसानों को उनकी जमीन का मुआवजा नहीं दिया था। यह मामला पिछले साल तक डीएम कोर्ट में विचाराधीन था। इसके अलावा शासन स्तर पर भी इस मामले की जांच लंबित है। आशंका जताई जा रही है कि बरेली-मुरादाबाद हाईवे के चौड़ीकरण के लिए जमीन अधिग्रहण में भी इस तरह की गड़बड़ी हो सकती है। कहा जा रहा है कि राजस्व रिकॉर्ड में एनएचएआई के नाम अधिग्रहीत जमीन को ट्रांसफर न करना और फिर फाइल गायब हो जाने के पीछे भी यही वजह हो सकती है।