शासन में जवाबदेही से बचने के लिए नया खेल
बरेली। राजेंद्रनगर आवासीय योजना को कारोबारी इलाके में तब्दील करा चुके आवास विकास परिषद के अफसरों ने शासन में अपनी जवाबदेही से बचने के लिए मकानों को तुड़वाकर उन्हें शोरूम और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में तब्दील करा देने वाले 13 आवंटियों पर एफआईआर तो करा दी लेकिन उसमें भी गोलमाल कर दिया। कई ऐसे आवंटियों के नाम एफआईआर में दिए गए हैं जिनके पास इन मकानों की मिल्कियत ही अब नहीं है। काफी समय पहले ही वे अपने मकान बेच चुके हैं। इसके अलावा कई लोगों को साफ-साफ छोड़ दिया गया है।
राजेंद्रनगर आवास विकास परिषद की शहर में पहली सबसे बड़ी आवासीय परियोजना थी जिसे 1980 के आसपास बसाया गया था। सन् 2000 में जब इससे सटे इलाके में डीडीपुरम व्यावसायिक क्षेत्र बसाया गया तो धीरे-धीरे राजेंद्रनगर का चेहरा भी बदलना शुरू हो गया। मेन रोड पर स्थित मकानों को तुड़वाकर दुकानों में तब्दील किया जाने लगा। आवास विकास परिषद के अफसरों ने इस पर रोक लगाने के बजाय इसे अपनी कमाई के लिए और बढ़ावा दिया। नतीजा यह हुआ कि धीरे-धीरे राजेंद्रनगर के पांच सौ से ज्यादा मकान व्यावसायिक ठिकानों में तब्दील हो गए। अब स्थिति यह है कि राजेंद्रनगर की मेन रोड बड़े-बड़े शोरूम, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, अस्पताल और रेस्त्रां भर गई है। अंदर के इलाकों में भी तमाम दुकानों ने राजेंद्रनगर का हुलिया बदलकर रख दिया है। इनमें सूरजभान डिग्री कॉलेज भी शामिल है जिसे सिर्फ प्राइमरी स्कूल खोलने की अनुमति थी लेकिन उसने अपने विशाल भूखंड का पूरा व्यावसायिक इस्तेमाल कर डाला।
पिछले सात-आठ सालों में इन अवैध निर्माणों के खिलाफ कार्रवाई के तमाम आदेश शासन से आए लेकिन खेल में मशगूल आवास विकास के अफसरों ने उन्हें अनदेखा कर दिया। पिछले साल फिर दबाव बढ़ा तो सूरजभान डिग्री कॉलेज को तोड़ने की कवायद शुरू की गई लेकिन उसे फिर अधूरा छोड़ दिया गया। 40 और आवंटियों को नोटिस दिए गए लेकिन उन पर भी कोई कार्रवाई नहीं की गई। आवास विकास परिषद के अफसरों की चुप्पी पर लगातार सवाल खड़े होने के बाद पिछले दिनों गुपचुप ढंग से 13 मामलों में एफआईआर करा दी गई लेकिन अब पता चला है कि अवैध निर्माण करने वालों को बचाने के लिए अफसरों ने एफआईआर कराने में भी गोलमाल कर दिया।
मिसाल यह है कि राजेंद्रनगर के बी- 15 और बी- 17 दोनों भूखंडों का आवंटन महेश नाम के शख्स के नाम है लेकिन दोनों मामलों में एफआईआर अलग-अलग नाम से कराई गई है। इसी तरह बी-13 और बी-11 का आवंटन राजीव नाम के शख्स को हुआ था लेकिन इस मामले में कोई कार्रवाई ही नहीं की गई। इसी तरह कई और मामलों में गोलमाल किया गया है। कुछ मामलों में ऐसे आवंटियों के नाम एफआईआर करा दी गई है जो सपंत्ति पहले ही बेच चुके हैं। अफसरों की इस कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं।
राजेंद्रनगर का किया सत्यानाश, अब नेताओं से मदद की आस, एफआईआर दर्ज होने से मची खलबली
आवास विकास परिषद ने राजेंद्रनगर में अवैध निर्माण करने वाले 40 लोगों को नोटिस देने के बाद सिर्फ 13 लोगों पर एफआईआर दर्ज कराई है, उसमें भी गड़बड़ी हो गई है लेकिन इसके बावजूद आवासीय परिसर को व्यावसायिक ठिकानों में बदलने वालों में खलबली मची हुई है। सूत्रों के मुताबिक कुछ लोगों ने आवास विकास परिषद के दफ्तर में चक्कर काटने शुरू कर दिए हैं तो कुछ लोग पुलिस से सेटिंग करने में जुट गए हैं। सूत्रों के मुताबिक एक गुट इस मामले में नेताओं से मदद लेने की जोड़तोड़ कर रहा है। हालांकि इसके बावजूद राजेंद्रनगर में कई जगह अवैध निर्माण अब भी जारी है। सवाल उठ रहा है कि अफसरों की ओर से ये अवैध निर्माण आखिर क्यों नहीं रोके जा रहे हैं।