दरअसल, सेवानिवृत्त वैज्ञानिक 1.10 करोड़ रुपये ट्रांसफर कराने के लिए बैंक पहुंचे तो शाखा प्रबंधक का माथा ठनका। उन्होंने पूछा कि इतनी बड़ी रकम आप किसे ट्रांसफर करवा रहे हैं। तब उन्होंने ने जवाब दिया कि वह भूखंड व मकान लेने वाले हैं, इसलिए रुपये भेज रहे हैं। इस जवाब पर प्रबंधक चुप हो गए। जब उनके खातों में रुपये खत्म हो गए तो भी ठगों की मांग नहीं खत्म हुई। तब वैज्ञानिक ने ठगों के कहने पर अपने एसबीआई खाते से पर्सनल ऋण के लिए आवेदन कर दिया।
19 जून को उनको तीस लाख रुपये का लोन स्वीकृत भी हो गया। जब अगले दिन वह रकम भी ठग मांगने लगे तो वैज्ञानिक वैज्ञानिक को ठगी का अहसास हो गया और उन्होंने बहाना बना दिया।
पुलिस कभी नहीं करती डिजिटल अरेस्ट
साइबर विशेषज्ञ इंस्पेक्टर नीरज सिंह के मुताबिक डिजिटल अरेस्ट का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। न ही पुलिस कभी किसी को कॉल करके खाते में रुपये डालने को कहती है। इसलिए पुलिस के नाम से कभी कोई फोन करे तो घबराएं नहीं, नजदीकी थाने में संपर्क करें। इसके साथ ही जब कभी किसी तरह की कॉल आए तो अपने परिजन या सहयोगी को जरूर बताएं। ठगी हो भी जाए तो तत्काल साइबर क्राइम पोर्टल 1930 टोल फ्री नंबर पर कॉल करें। साथ ही
cybercrime.gov.in पर भी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
साइबर क्राइम पोर्टल पर दर्ज की शिकायत
वैज्ञानिक ने 24 जून को नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल 1930 पर शिकायत दर्ज कराई। फिर वह साइबर क्राइम थाने आए और पुलिस को घटना के बारे में बताया। इंस्पेक्टर नीरज सिंह ने खातों में भेजी गई रकम फ्रीज करने के लिए ई-मेल की। फिर उनसे तहरीर ली। बृहस्पतिवार रात एफआईआर दर्ज की गई। साइबर थाना प्रभारी दिनेश शर्मा ने बताया कि मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। बंगलूरू पुलिस से संपर्क किया जा रहा है। कितनी रकम फ्रीज हो सकती है, इसका पता भी जल्दी लगा लिया जाएगा।