व्यापारी को सड़क हादसे में घायल होने के बाद जिला अस्पताल लाया गया था। बाद में पहुंचे उसके घरवालों ने जिंदा होने के बावजूद उसे फ्रीजर में रखवा देने का आरोप लगाया तो पूरा स्टाफ सकते में आ गया।
व्यापारी का निजी अस्पताल में भी परीक्षण कराया गया, मगर वह मृत ही निकला। सीएमएस का कहना है कि एक कर्मचारी ने ही व्यापारी के घरवालों को भड़काकर हंगामा कराया। मामले की जांच कराई जा रही है।
शीशगढ़ के मोहल्ला साहूकारा में रहने वाले मिठाई व्यापारी 21 वर्षीय दीपू रस्तोगी शुक्रवार दोपहर दो बजे एलर्जी की दवा लेने बाइक से दोस्त नईम के साथ बरेली आए थे।
नईम के भाई ने इसी बीच फोन कियातो वह शाम छह बजे ही बस से घर लौट गया। देर रात दवा लेकर दीपू अकेले बाइक पर घर के लिए निकले।
रात नौ बजे दिल्ली हाईवे पर बैगुल नदी के पुल पर किसी भारी वाहन ने बाइक में पीछे से टक्कर मार दी। इससे दीपू गंभीर रूप से घायल हो गए। मौके पर पहुंची पुलिस ने उन्हें एंबुलेंस से जिला अस्पताल भेज दिया।
जिला अस्पताल में इमरजेंसी ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर और स्टाफ ने परीक्षण के बाद दीपू को मृत घोषित कर शव को मोरचरी के फ्रीजर में रखवा दिया गया। करीब तीन घंटे बाद दीपू के परिजन पहुंचे।
पिता पिंटू रस्तोगी ने शव देखा तो उसकी सांसें चलने की बात कहते हुए हंगामा शुरू कर किया। डॉक्टर ने उनके सामने फिर पल्स और धड़कन चेक करके उसे मृत बताया लेकिन परिवार दीपू के जिंदा होने की बात पर अड़ा रहा।
इस पर डॉक्टर ने कोतवाली से पुलिस बुला ली। पिंटू रस्तोगी ने पुलिस के सामने बेटे को निजी अस्पताल में दिखाने की इच्छा जताई और लिखापढ़ी कर दीपू को निजी अस्पताल में ले गए। वहां भी उसे मृत घोषित कर दिया गया। पुलिस ने पोस्टमार्टम को कहा तो परिजन कोई कार्रवाई न करने की बात लिखकर शव बिना पोस्टमार्टम ही घर ले गए।
हंगामे के दौरान पहुंचे जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. टीएस आर्या का कहना था कि दीपू की मौत की पुष्टि होने के बाद ही उसे मोरचरी में रखवाया गया था। इस मामले में लापरवाही का सवाल ही नहीं उठता। हालांकि जानकारी मिली है कि मोरचरी के पास किसी कर्मचारी ने ही दीपू के परिवार को उसके जिंदा होने की भ्रामक सूचना देकर भड़काया था। उस कर्मचारी के बारे में जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी।
पिता ने कहा, तीन घंटे फ्रीजर में रखने से हुई मौत
पिता पिंटू रस्तोगी का आरोप था कि दीपू का हेलमेट और मफलर ऐसे ही लगा हुआ था। डॉक्टर ने उसे लावारिस मानकर ठीक से चेक ही नहीं किया। ठीक इलाज होता तो वह बच जाता। उसे फ्रीजर में और रखवा दिया। जब निकाला तो कई लोगों के सामने उसकी धड़कन चलती मिली। उन लोगों ने इसका वीडियो भी बनाया। निजी अस्पतालों में दीपू को मृत घोषित किया तो वह शव ले आए। उन्हें कोई क्लेम नहीं चाहिए पर डॉक्टरों को ऐसा नहीं करना चाहिए।
हंगामे की सूचना पर दरोगा श्रीचंद को जिला अस्पताल भेजा था। पता लगा कि दीपू को मौत पुष्टि के बाद ही मोरचरी में रखवाया गया था। परिवार को गलतफहमी हुई थी। प्राइवेट अस्पतालों में भी मृत होने की पुष्टि के बाद पोस्टमार्टम कराने को कहा मगर उन्होंने इनकार कर दिया। - गीतेश कपिल, इंस्पेक्टर कोतवाली