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लाड़लों के लिए सबकुछ ‘लुटाकर’ दर-दर की ठोकरें खा रहे बागवां

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बरेेली। जवानी में जिन लोगों ने औलाद की खातिर सबकुछ दांव पर लगा दिया, बुढ़ापा आया तो वही औलाद बेगानी हो गई। किसी को अपने बुजुर्ग मां-बाप की दर्द-तकलीफ नाटक लगने लगा तो कोई यह शिकायत करके नजरें फेरकर चला गया कि उन्होंने उसके लिए कुछ किया ही नहीं। वृद्धाश्रमों में बुढ़ापा काट रहे हर बुजुर्ग की जुबां पर आंसुओं में भीगी कोई न कोई दास्तां है। कुछ बुजुर्गों को वृद्धाश्रम का एक कोना भी मयस्सर नहीं हो पाया, ले लोग इधर-उधर भटकते हुए जीवन के अंतिम दिन काट रहे हैं। समाज में दयानतदारी अभी कुछ जिंदा है और इसीलिए इनकी जिंदगी के दिन कुछ बढ़ गए हैं मगर उनका अपना मानना है कि उनकी यह जिंदगी मौत से भी बदतर है।
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पुलिस की निगाह में भी बुजुर्गों का दर्द
पारिवारिक विवाद, कार्रवाई नहीं करती
थानों के चक्कर काटने के बाद भी कई बुजुर्गों को नहीं मिला इंसाफ
बरेली। बुजुर्गों के संरक्षण कई कानून हैं और उन्हें कानूनी मदद देने के तमाम दावे भी किए जाते हैं मगर हकीकत इससे उलट है। अपनों के सताए बुजुर्ग जब इंसाफ के लिए पुलिस के पास पहुंचते हैं तो वह भी पारिवारिक विवाद बताकर टाल देती है। अफसरों का जोर रहता है कि कानूनी कार्रवाई के बजाय समस्या का समाधान हो जाए। अमर उजाला ने थानों में इस तरह के केसों को खंगाला तो यही हकीकत सामने आई। ज्यादातर मामलों में पीड़ित बुजुर्गों को इंसाफ नहीं मिल पाया और थकहारकर वे चुपचाप बैठ गए।
बेटों ने हाथ पर नोट रखे तो खामोश हो गई पुलिस
भोजीपुरा इलाके में रहने वाले आईवीआरआई के रिटायर कर्मचारी और उनकी पत्नी अपनी ही औलाद से दुखी हैं। उनके चार बेटे हैं जिनमें से दो अक्सर उन्हें पीट देते हैं। विवाद की जड़ जमीन है जिस पर मां-बाप की सेवा का वादा किए बगैर बेटे कब्जा करके उन्हें बेदखल करना चाहते हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने एसएसपी दफ्तर में शिकायत कर मांग की कि उनके बेटों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। पीड़ित ने बताया कि वह कई दिन से इंतजार कर रहे थे। शुक्रवार को दो पुलिसकर्मी आकर उनके घर आकर बेटों को थाने आने को कह गए। पहले भी शिकायत पर ऐसा ही हुआ था, तब पुलिसकर्मियों को उनके सामने ही बेटों ने कुछ सुविधाशुल्क दिया और उसके बाद उनकी शिकायत रद्दी की टोकरी में चली गई। उन्हें डर है कि इस बार कहीं ऐसा ही न हो।
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बेटे कहते हैं- मौका देखकर गला दबा देंगे
इज्जतनगर की कॉलोनी में मकान बनाकर रहे नवाबगंज निवासी बुजुर्ग दो सितंबर को एसएसपी दफ्तर आए थे। कहना था कि तीन बेटों में से दो ने उनकी जिंदगी नर्क बना दी है। वे दंपति को मारते पीटते हैं और जीतेजी मकान और जमीन नाम करने को कहते हैं। कई बार घर से निकालने की कोशिश की है। धमकी देते हैं कि ऐसा न किया तो मौका देखकर किसी दिन गला दबा देंगे। उनकी जान खतरे में है, दोनों के खिलाफ कार्रवाई न हुई तो वे कुछ कर बैठेंगे। शनिवार को बुजुर्ग ने बताया कि आज तक पुलिस उनके घर नहीं आई है और न ही उनके बेटों से बात की है। वे क्या करें, समझ नहीं आ रहा है।
कागजों पर रखती है पुलिस बुजुर्गों का ख्याल
यूं तो आईपीसी में किसी आयुवर्ग के लोगों को अलग प्राथमिकता देने की व्यवस्था नहीं है पर डीजीपी के निर्देश से हर थाने में वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगों की शिकायतों से संबंधित अलग रजिस्टर बनाने के निर्देश हैं। इनमें अफसरों और थानों में शिकायत करने वाले बुजुर्गों के नंबर और शिकायत अलग से दर्ज करने का प्रावधान है। शिकायतों के निस्तारण की स्थिति और मॉनीटरिंग करने के भी मिर्देश हैं जो आमतौर पर कागजों में चलते रहते हैं। जाहिर है कि अलग व्यवस्था होने पर भी बुजुर्गों की शिकायत पर प्राथमिकता से कार्रवाई नहीं होती तो सामान्य मामलों में क्या हाल होता होगा।
सत्संगी दंपति हत्याकांड के बाद सजग हुए थे अफसर
हाल ही में प्रेमनगर थाना क्षेत्र में घर में अकेले रहने वाली बैंक की सहायक प्रबंधक और उनके बुजुर्ग पति की हत्या कर दी गई थी। हत्याकांड के बाद मौके पर पहुंचे एडीजी अविनाश चंद्र ने पुलिस को निर्देश दिए थे कि वह घरों में अकेले रह रहे बुजुर्गों से संवाद स्थापित करे और समय-समय पर उनका हाल पूछती रहे। कुछ दिन पुलिस इस पर सक्रिय दिखी पर बाद में फिर पुराने ढर्रे पर आ गई।
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