बरेली। बच्चा अकेले किसी से बातचीत करे, टोकने पर आक्रोशित हो जाए, जहां कोई न हो वहां भी आदमी दिखाई देने की बात कहे तो सतर्क हो जाएं। ये कोई ऊपरी चक्कर नहीं बल्कि मनोरोग सिजोफ्रेनिया के लक्षण हैं। इस रोग के लक्षण बड़ों में ही नहीं बल्कि बच्चों में भी नजर आ रहे हैं।
जिला अस्पताल मनकक्ष के मनोचिकित्सक डाॅ. आशीष के मुताबिक सिजोफ्रेनिया मनोरोग की जानकारी न होने से गांव समेत शहरी क्षेत्र में भी लोग इसे भूत-प्रेत का चक्कर मानते हैं। तांत्रिक और झाड़फूंक के फेर में पड़कर इलाज का सही समय गंवा देते हैं। वहीं, बच्चों में जब ऐसी हरकतें नजर आती हैं तो अभिभावक परेशान हो जाते हैं। वे इससे छुटकारे के लिए हर संभव प्रयास करते हैं, लेकिन ये मनोरोग है, यह समझने में अक्सर देर करते हैं। यही देरी रोगी बच्चे पर भारी पड़ती है। उनके अनुसार ओपीडी में प्रतिमाह करीब डेढ़ सौ सिजोफ्रेनिया से पीड़ित मरीज आते हैं। इनमें से बच्चों की संख्या चार से पांच होती है। अक्सर बच्चों की इन हरकत को लोग नाटक या खेल समझकर नजरंदाज करते हैं, जो दिमागी क्षमता को प्रभावित करता है। इसलिए अगर कोई बच्चा ऐसी हरकत करता दिखाई दे तो एहतियातन मनकक्ष पर संपर्क या कॉल करें।
मनोचिकित्सक के मुताबिक सिजोफ्रेनिया की मुख्य वजह मानसिक तनाव होती है। पर बच्चों में ये समस्या परिवार में पूर्व में कभी किसी व्यक्ति के इससे पीड़ित होने की वजह से भी हो सकती है। क्योंकि यह बीमारी आनुवांशिक भी होती है। कुपोषण की वजह से भी मानसिक विकास प्रभावित होने से यह समस्या हो सकती है। जन्म के बाद माता-पिता की मौत हो जाए तो भी इसकी चपेट में आने की आशंका रहती है।
केस 1- धौराटांडा निवासी एक महिला के सात, आठ, दस और 13 वर्षीय चार बेटे किसी के साथ नहीं ठहरते। न ही बातचीत करते हैं। अकेले में वे किसी से बातचीत करते हैं, जब वहां कोई और न हाेता। झाड़फूंक से पहले मनकक्ष में संपर्क किया तो मनोरोग का पता चला। इलाज जारी है।
केस 2- शहर निवासी एक व्यक्ति ने मनकक्ष में संपर्क कर बताया कि उनका बेटा रात में छत पर अकेले बैठता है। बीच-बीच में कुछ बोलता रहता है। पहले इसे नाटक समझा लेकिन जब उन्होंने पूछा तो उसने बताया कि तीन लोग उससे मिलने आते हैं। अब वह मनकक्ष में संपर्क कर इलाज करा रहे हैं।